NCERT Notes For Class 9 Economics Chapter 3 In Hindi निर्धनता: एक चुनौती

Class 9 Economics Chapter 3 In Hindi निर्धनता: एक चुनौती

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NCERT Notes For Class 9 Economics Chapter 3 In Hindi निर्धनता: एक चुनौती

 

अवलोकन

इस अध्याय में निर्धनता के विषय में चर्चा की गई है , जो स्वतंत्र भारत के सम्मुख एक सर्वाधिक कठिन चुनौती है ।

परिचय

  • अपने दैनिक जीवन में हम अनेक ऐसे लोगों के संपर्क में आते हैं , जिनके बारे में हम सोचते हैं कि वे निर्धन हैं ।
  • वे गाँवों भूमिहीन श्रमिक भी हो सकते हैं और शहरों की भीड़ भरी झुग्गियों में रहने वाले लोग भी ।
  • वे निर्माण स्थलों के दैनिक वेतनभोगी श्रमिक भी हो सकते हैं और ढाबों में काम करने वाले निर्धनता : एक चुनौती : बाल श्रमिक भी ।
  • वे चिथड़ों में बच्चे उठाए भिखारी भी हो सकते हैं ।
  • देश का हर चौथा व्यक्ति निर्धन है ।
  • वर्ष 2011-12 में भारत में मोटे तौर पर 270 मिलीयन या 27 करोड़ लोग निर्धनता में जीते हैं ।

 

निर्धनता से संबद्ध निम्नलिखित मुद्दों:-

  • भूमिहीनता
  • बेरोज़गारी
  • परिवार का आकार
  • निरक्षरता खराब स्वास्थ्य / कुपोषण
  • बाल – श्रम
  • असहायता

अपने करोड़ों लोगों को दयनीय निर्धनता से बाहर निकालना स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रही है ।

महात्मा गांधी हमेशा इस पर बल दिया करते थे कि भारत सही अर्थों में तभी स्वतंत्र होगा , जब यहाँ का सबसे निर्धन व्यक्ति भी मानवीय व्यथा से मुक्त होगा ।

 

निर्धनता रेखा

‘ निर्धनता रेखा ‘ की अवधारणा

  • निर्धनता के आकलन की एक सर्वमान्य सामान्य विधि आय अथवा उपभोग स्तरों पर आधारित है ।
  • किसी व्यक्ति को निर्धन माना जाता है , यदि उसकी आय या उपभोग स्तर किसी ऐसे न्यूनतम स्तर से नीचे गिर जाए जो मूल आवश्यकताओं के एक दिए हुए समूह को पूर्ण करने के लिए आवश्यक है ।
  • निर्धनता रेखा का आकलन करते समय खाद्य आवश्यकता के लिए वर्तमान सूत्र वांछित कैलोरी आवश्यकताओं पर आधारित है ।
  • भारत में स्वीकृत कैलोरी आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन
  • नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है ।
  • चूँकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अधिक शारीरिक कार्य करते हैं , अतः ग्रामीण क्षेत्रों में कैलोरी आवश्यकता शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक मानी गई है ।
  • इन आधार पर वर्ष 2011-12 में किसी व्यक्ति के लिए निर्धनता रेखा का निर्धारण ग्रामीण क्षेत्रों में 816 . रुपये प्रतिमाह और शहरी क्षेत्रों में 1000 रुपये प्रतिमाह किया गया था ।
  • वर्ष 2011-12 में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाला पाँच सदस्यों का परिवार निर्धनता रेखा के नीचे होगा , यदि उसकी आय लगभग 4,080 रुपये प्रतिमाह से कम है ।
  • इसी तरह के परिवार को शहरी क्षेत्रों में अपनी मूल आवश्यकताएँ पूरा करने के लिए कम से कम 5,000 रुपये प्रतिमाह की आवश्यकता होगी ।
  • विकासशील देशों के बीच तुलना करने के लिए विश्व बैंक जैसे अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठन निर्धनता रेखा के लिए एक समान मानक का प्रयोग करते हैं , जैसे $ 1.9 ( 2011 पी.पी.पी. ) प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन के समतुल्य न्यूनतम उपलब्धता के आधार पर

 

निर्धनता के अनुमान

  • भारत में निर्धनता अनुपात में वर्ष 1993-94 में लगभग 45 प्रतिशत से वर्ष 2004-05 में 37.2 प्रतिशत तक महत्त्वपूर्ण गिरावट आई है ।
  • वर्ष 2011-12 में निर्धनता रेखा के नीचे के निर्धनों का अनुपात और भी गिर कर 22 प्रतिशत पर आ गया ।
  • निर्धन लोगों की संख्या वर्ष 2004-05 में 407 मिलियन से गिरकर 270 मिलियन वर्ष 2011-12 जिसमें औसतन गिरावट 2.2 प्रतिशत वर्ष 2004-05 से 2011-12 के बीच में हुई है ।

 

असुरक्षित समूह

  • जो सामाजिक समूह निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं , वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवार हैं ।
  • आर्थिक समूहों में सर्वाधिक असुरक्षित समूह , ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार और नगरीय अनियत मज़दूर परिवार हैं ।
  • निर्धनता रेखा के नीचे के लोगों का औसत भारत में सभी समूहों के लिए 22 है , अनुसूचित जनजातियों के 100 में से 43 लोग अपनी मूल आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हैं ।
  • नगरीय क्षेत्रों में 34 प्रतिशत अनियत मज़दूर निर्धनता रेखा के नीचे हैं ।
  • लगभग 34 प्रतिशत अनियत कृषि श्रमिक ग्रामीण क्षेत्र में और 29 प्रतिशत अनुसूचित जातियाँ भी निर्धन हैं ।
  • अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सामाजिक रूप से सुविधावंचित सामाजिक समूहों का भूमिहीन अनियत दिहाड़ी श्रमिक होना उनकी दोहरी असुविधा की समस्या की गंभीरता को दिखाता है ।

 

अंतर्राज्यीय असमानताएँ

  • प्रत्येक राज्य में निर्धन लोगों का अनुपात एक समान नहीं है ।
  • वर्ष 2011-12 भारत में निर्धनता अनुपात 22 प्रतिशत है । कुछ राज्य जैसे मध्य प्रदेश , असम , उत्तर प्रदेश , बिहार एवं ओडिशा में निर्धनता अनुपात राष्ट्रीय अनुपात से ज्यादा है ।
  • बिहार और ओडिशा क्रमश : 33.7 और 32.6 प्रतिशत निर्धनता औसत के साथ दो सर्वाधिक निर्धन राज्य बने हुए हैं ।
  • ओडिशा , मध्य प्रदेश , बिहार और उत्तर प्रदेश में ग्रामीण निर्धनता के साथ नगरीय निर्धनता भी अधिक है ।
  • इसकी तुलना में केरल , महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु , गुजरात और पश्चिम बंगाल में निर्धनता में उल्लेखनीय गिरावट आई है ।
  • पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य उच्च कृषि वृद्धि दर से निर्धनता कम करने में पारंपरिक रूप से सफल रहे हैं ।

गरीबी कम करने के लिए राज्यों द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम

  • केरल ने मानव संसाधन विकास पर अधिक ध्यान दिया है ।
  • पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार उपायों से निर्धनता कम करने में सहायता मिली है ।
  • आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में अनाज का सार्वजनिक वितरण इसमें सुधार का कारण हो सकता है ।

 

वैश्विक निर्धनता परिदृश्य

  • विभिन्न देशों में अत्यंत आर्थिक निर्धनता ( विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार प्रतिदिन $ 1.9 से कम पर जीवन निर्वाह करना ) में रहने वाले लोगों का अनुपात 1990 के 36 प्रतिशत से गिर कर 2015 में 10 प्रतिशत हो गया है ।
  • चीन में निर्धनों की संख्या 1981 के 88.3 प्रतिशत से घट कर 2008 में 14.7 प्रतिशत और वर्ष 2015 में 0.7 प्रतिशत रह गई है ।
  • दक्षिण एशिया के देशों ( भारत , पाकिस्तान , श्रीलंका , नेपाल , बाँग्ला देश , भूटान ) में निर्धनों की संख्या में गिरावट इतनी ही तीव्र रही है और 2005 में 34 प्रतिशत से गिरकर 2013 में 16.2 प्रतिशत हो गई है ।
  • निर्धनों के प्रतिशत में गिरावट के साथ ही निर्धनों की संख्या में भी कमी आई , जो 2005 में 510.4 मिलीयन से घट कर 2013 में 274.5 मिलीयन रह गई है ।
  • सब- सहारा अफ्रीका में निर्धनता वास्तव में 2005 के 41 प्रतिशत हो गई है 51 प्रतिशत से घटकर 2015 में 41 ।
  • लैटिन अमेरिका में निर्धनता का अनुपात वही रहा है । यहाँ पर निर्धनता रेखा 2005 में 10 प्रतिशत से गिर कर 2015 में 4 प्रतिशत रह गई है ।

 

निर्धनता के कारण

उपनिवेशवाद का प्रभाव

भारत में व्यापक निर्धनता के अनेक कारण हैं ।

  1. एक ऐतिहासिक कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के दौरान आर्थिक विकास का निम्न स्तर है ।
  2. औपनिवेशिक सरकार की नीतियों ने पारंपरिक हस्तशिल्पकारी को नष्ट कर दिया और वस्त्र जैसे उद्योगों के विकास को हतोत्साहित किया ।
  3. विकास की धीमी दर 1980 के दशक तक जारी रही ।
  4. इसके परिणामस्वरूप रोजगार के अवसर घंटे और आय की वृद्धि दर गिरी ।
  5. इसके साथ – साथ जनसंख्या में उच्च दर से वृद्धि हुई इन दोनों ने प्रतिव्यक्ति आय की संवृद्धि दर को बहुत कम कर दिया ।
  6. आर्थिक प्रगति को बढ़ावा और जनसंख्या नियंत्रण , दोनों मोर्चों पर असफलता के कारण निर्धनता का चक्र बना रहा ।

असमान वितरण

  • उच्च निर्धनता दर की एक और विशेषता आय रही है ।
  • इसका एक प्रमुख कारण भूमि और अन्य संसाधनों का असमान वितरण है ।
  • अनेक नीतियों के बावजूद हम किसी सार्थक ढंग से इस मुद्दे से नहीं निपट सके हैं ।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में परिसंपत्तियों के पुनर्वितरण पर लक्षित भूमि सुधार जैसी प्रमुख नीति पहल को ज्यादातर राज्य सरकारों ने प्रभावी ढंग से कार्यान्वित नहीं किया ।
  • चूँकि भारत में भूमि – संसाधनों की कमी निर्धनता का एक प्रमुख कारण रही है

सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव

  • अनेक अन्य सामाजिक – सांस्कृतिक और आर्थिक कारक भी निर्धनता के लिए उत्तरदायी हैं ।
  • र्धनों सहित भारत लोग सामाजिक दायित्वों और धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में बहुत पैसा खर्च करते हैं ।
  • चूँकि निर्धन कठिनाई से ही कोई बचत कर पाते हैं , वे इनके लिए कर्ज लेते हैं ।
  • निर्धनता के चलते पुन : भुगतान करने में असमर्थता के कारण वे ऋणग्रस्त हो जाते हैं ।
  • अत्यधिक ऋणग्रस्तता निर्धनता का कारण और परिणाम दोनों है ।

 

निर्धनता – निरोधी उपाय

सरकार की वर्तमान निर्धनता – निरोधी रणनीति मोटे तौर पर दो कारकों

( 1 ) आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन और

( 2 ) लक्षित निर्धनता – निरोधी कार्यक्रमों पर निर्भर है ।

  • विकास की उच्च दर ने निर्धनता को कम करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
  • इसलिए यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आर्थिक संवृद्धि और निर्धनता उन्मूलन के बीच एक घनिष्ठ संबंध है ।
  • आर्थिक संवृद्धि अवसरों को व्यापक बना देती है और मानव विकास में निवेश के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराती है ।

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम

  • महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम 2005 ( मनरेगा ) का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षित करने के लिये हर घर के लिये मजदूरी रोजगार कम से कम 100 दिनों के लिये उपलब्ध कराना है ।
  • इसका उद्देश्य सतत् विकास में मदद करना ताकि सूखा , वन कटाई एवं मिट्टी के कटाव जैसी समस्यओं से बचा जा सके ।
  • इस प्रावधान के तहत एक – तिहाई रोजगार महिलाओं के लिये सुरक्षित किया गया है ।

राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कोष

  • केंद्र सरकार राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कोष भी स्थापित करेगी ।
  • इसी तरह राज्य सरकारें भी योजना के कार्यान्वयन के लिए राज्य रोजगार गारंटी कोष की स्थापना करेंगी ।
  • कार्यक्रम के अंतर्गत अगर आवेदक को 15 दिन के अंदर रोजगार उपलब्ध नहीं कराया गया तो वह दैनिक बेरोज़गार भत्ते का हकदार होगा ।

प्रधानमंत्री रोजगार योजना

  • प्रधानमंत्री रोजगार योजना एक योजना है , जिसे 1993 में आरंभ किया गया ।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में शिक्षित बेरोजगार युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर सृजित करना है ।
  • उन्हें लघु व्यवसाय और उद्योग स्थापित करने में उनकी सहायता दी जाती है ।

ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम

  • ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम का आरंभ 1995 में किया गया ।
  • इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में स्वरोजगार के अवसर सृजित करना है ।

स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना

  • स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना का आरंभ 1999 में किया गया ।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य सहायता प्राप्त निर्धन परिवारों को स्वसहायता समूहों में संगठित कर बैंक ऋण और सरकारी सहायिकी के संयोजन द्वारा निर्धनता रेखा से ऊपर लाना है ।

प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना

प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना ( 2000 में आरंभ ) के अंर्तगत प्राथमिक स्वास्थ्य प्राथमिक शिक्षा , ग्रामीण आश्रय , ग्रामीण पेयजल और ग्रामीण विद्युतीकरण जैसी मूल सुविधाओं के लिए राज्यों को अतिरिक्त केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है ।

 

भावी चुनौतियाँ

  • भावी चुनौतियाँ भारत में निर्धनता में निश्चित रूप से गिरावट आई है , लेकिन प्रगति के बावजूद निर्धनता उन्मूलन भारत की एक सबसे बाध्यकारी चुनौती है ।
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों और विभिन्न राज्यों में निर्धनता में व्यापक असमानता है ।
  • आशा की जा रही है कि निर्धनता उन्मूलन में अगले दस से पंद्रह वर्षों में अधिक प्रगति होगी ।
  • यह मुख्यतः उच्च आर्थिक संवृद्धि , सर्वजनीन निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा पर जोर जनसंख्या विकास में गिरावट , महिलाओं और समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बढ़ते सशक्तीकरण के कारण संभव हो सकेगा ।

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