NCERT Notes For Class 11 History Chapter 2 In Hindi लेखन कला और शहरी जीवन

Class 11 History Chapter 2 In Hindi लेखन कला और शहरी जीवन

NCERT Notes For Class 11 History Chapter 2 In Hindi लेखन कला और शहरी जीवन, (History) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided step-by-step NCERT Notes for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

NCERT Notes For Class 11 History Chapter 2 In Hindi लेखन कला और शहरी जीवन

 

  • मेसोपोटामिया नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों मेसोस ( Mesos ) यानी मध्य और पोटैमोस be ( Potamos ) यानी नदी से मिलकर बना है ।
  • मेसोपोटामिया फ़रात ( Euphrates ) और दज़ला ( Tigris ) नदियों के बीच स्थित यह प्रदेश आजकल इराक गणराज्य का हिस्सा है ।
  • मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी संपन्नता , शहरी जीवन , विशाल एवं समृद्ध साहित्य , गणित और खगोलविद्या के लिए प्रसिद्ध है ।
  • मेसोपोटामिया की लेखन प्रणाली और उसका साहित्य पूर्वी भूमध्यसागरीय प्रदेशों और उत्तरी सीरिया तथा तुर्की में 2000 ई.पू. के बाद फैला |
  • इसके शहरीकृत दक्षिणी भाग को ( नीचे विवरण देखें ) सुमेर ( Sumer ) और अक्कद ( Akkad ) कहा जाता था ।
  • 2000 ई.पू. के बाद जब बेबीलोन एक महत्त्वपूर्ण शहर बन गया तब दक्षिणी क्षेत्रको बेबीलोनिया कहा जाने लगा ।
  • लगभग 1100 ई.पू. से , जब असीरियाइयों ने उत्तर में अपना राज्य स्थापित कर लिया , तब उस क्षेत्र को असीरिया ( Assyria ) कहा जाने लगा ।
  • उस प्रदेश की प्रथम ज्ञात भाषा सुमेरियन यानी सुमेरी थी । धीरे – धीरे 2400 ई.पू. के आसपास जब अक्कदी भाषी लोग यहाँ आ गए तब अक्कदी ने सुमेरी भाषा का स्थान ले लिया ।
  • 1400 ई.पू. से धीरे – धीरे अरामाइक ( Aramaic ) भाषा का भी प्रवेश शुरू हुआ ।
  • इतिहास के स्रोतों के रूप में सैकड़ों की संख्या में इमारतों , मूर्तियों , आभूषणों कब्रों औज़ारों और मुद्राओं का ही नहीं बल्कि हज़ारों की संख्या में लिखित दस्तावेज़ों का भी अध्ययन कर सकते हैं ।

 

मेसोपोटामिया और उसका भूगोल

  • इराक भौगोलिक विवधता का देश है ।
  • इसके पूर्वोत्तर भाग में हरे – भरे , ऊँचे – नीचे मैदान हैं जो धीरे – धीरे वृक्षाच्छादित पर्वत शृंखला के रूप में फैलते गए हैं ।
  • साथ ही यहाँ स्वच्छ झरने तथा जंगली फूल हैं । यहाँ अच्छी फ़सल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाती है ।
  • यहाँ 7000 से 6000 ई.पू. के बीच खेती शुरू हो गई थी ।
  • उत्तर में ऊँची भूमि है जहाँ ‘ स्टेपी ‘ घास के मैदान हैं , यहाँ पशुपालन खेती की तुलना में आजीविका का अधिक अच्छा साधन है ।
  • सर्दियों की वर्षा के बाद , भेड़ – बकरियाँ यहाँ उगने वाली छोटी – छोटी झाड़ियों और घास से अपना भरण – पोषण करती हैं ।
  • पूर्व में दज़ला की सहायक नदियाँ ईरान के पहाड़ी प्रदेशों में जाने के लिए परिवहन का अच्छा साधन हैं ।
  • दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है और यही वह स्थान है जहाँ सबसे पहले नगरो और लेखन प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ । इन रेगिस्तानों में शहरों के लिए भरण – पोषण का साधन बन सकने की क्षमता थी ।
  • क्योंकि फ़रात और दज़ला नाम की नदियाँ उत्तरी पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाऊ बारीक मिट्टी लाती रही हैं ।
  • जब इन नदियों में बाढ़ आती है अथवा जब इनके पानी को सिंचाई के लिए खेतों में ले जाया जाता है तब यह उपजाऊ मिट्टी वहाँ जमा हो जाती है ।
  • खेती के अलावा भेड़ – बकरियाँ स्टेपी घास के मैदानों पूर्वोत्तरी मैदानों और पहाड़ों के ढालों पर पाली जाती थीं , जिनसे भारी मात्रा में मांस , दूध और ऊन आदि वस्तुएँ मिलती थीं । इसके अलावा , नदियों में मछलियों की कोई कमी नहीं थी और गर्मियों में खजूर के पेड़ खूब फल ( पिंड खजूर ) देते थे ।

 

शहरीकरण का महत्त्व

  • शहरी अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार , उत्पादन और का मतलब है कि ये धातुएँ तरह – तरह की सेवाओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । नगर के लोग आत्मनिर्भर नहीं रहते और उन्हें नगर या गाँव के अन्य लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं या दी जाने वाली सेवाओं के लिए उन पर आश्रित होना पड़ता है । उनमें आपस में बराबर लेन – देन होता रहता है ।
  • उदाहरण के लिए , एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर उकेरने के लिए काँसे के औज़ारों की जरूरत पड़ती है वह स्वयं ऐसे औज़ार नहीं बना सकता और वह यह भी नहीं जानता कि मुद्राओं के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर वह कहाँ से प्राप्त करे ।
  • श्रम विभाजन ( Division of Labour ) शहरी जीवन की विशेषता है ।
  • शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना भी जरूरी है । शहरी विनिर्माताओं के लिए ईंधन , धातु , विभिन्न प्रकार के पत्थर , लकड़ी आदि जरूरी चीजें भिन्न – भिन्न जगहों से आती हैं जिनके लिए संगठित व्यापार और भंडारण की भी आवश्यकता होती है । शहरों में अनाज और अन्य खाद्य पदार्थ गाँवों से आते हैं |

 

शहरों में माल की आवाजाही

  • दक्षिण के अधिकांश भागों में औज़ार , मोहरें ( मुद्राएँ ) और आभूषण बनाने के लिए पत्थरों की कमी थी । इराकी खजूर और पोपलार के पेड़ों की लकड़ी , गाड़ियाँ , गाड़ियों के पहिए या नावें बनाने के लिए कोई खास अच्छी नहीं थी ; और औज़ार , पात्र , या गहने बनाने के लिए कोई धातु वहाँ उपलब्ध नहीं थी ।
  • मेसोपोटामियाई लोग संभवत : लकड़ी , ताँबा , राँगा , चाँदी , सोना , सीपी और विभिन्न प्रकार के पत्थरों को तुर्की और ईरान अथवा खाड़ी – पार के देशों से मंगाते थे |
  • इन वस्तुओं का नियमित रूप से आदान – प्रदान तभी संभव होता जब इसके लिए कोई सामाजिक संगठन हो जो विदेशी अभियानों और विनिमयों को निर्देशित करने में सक्षम हो ।
  • शिल्प , व्यापार और सेवाओं के अलावा , कुशल परिवहन व्यवस्था भी शहरी विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है । भारवाही पशुओं की पीठ पर रखकर या बैलगाड़ियों में डालकर शहरों में अनाज या काठ कोयला लाना ले जाना बहुत कठिन होता है | शहरी अर्थव्यवस्था इसका बोझ उठाने के लिए सक्षम नहीं होती ।
  • परिवहन का सबसे सस्ता तरीका सर्वत्र जलमार्ग ही होता है । अनाज के बोरों से लदी हुई नावें या बजरे , नदी की धारा अथवा हवा के वेग से चलते हैं , जिसमें कोई खर्चा नहीं लगता ,
  • पुराने मेसोपोटामिया की नहरें और प्राकृतिक जलधाराएँ छोटी – बड़ी बस्तियों के बीच माल के परिवहन का अच्छा मार्ग थीं ।

 

लेखन कला का विकास

  • सभी समाजों के पास अपनी एक भाषा होती है जिसमें उच्चरित ध्वनियाँ अपना अर्थ प्रकट करती हैं । इसे मौखिक या शाब्दिक भावाभिव्यक्ति कहते हैं । लिखना , मौखिक भावाभिव्यक्ति से उतना अलग नहीं है जितना हम अकसर समझ बैठते हैं ।
  • मेसोपोटामिया में जो पहली पट्टिकाएँ ( Tablet ) पाई गई . हैं वे लगभग 3200 ई.पू. की हैं । उनमें चित्र जैसे चिह्न और संख्याएँ दी गई हैं । वहाँ बैलों , मछलियों और आदि की लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं , जो वहाँ के दक्षिणी शहर उरुक के मंदिरों में आने वाली और वहाँ से बाहर जाने वाली चीज़ों की होंगी ।
  • मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे । लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता था और फिर उसको गूंध कर और थापकर एक ऐसे आकार की पट्टी का रूप दे देता था जिसे वह आसानी से अपने एक हाथ में पकड़ सके ।
  • वह सावधानीपूर्वक उसकी सतहों को चिकना बना लेता था फिर सरकंडे की तीली की तीखी नोक से वह उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न ( cuneiform * ) बना देता था । जब ये पट्टिकाएँ धूप में सूख जाती थीं तो पक्की हो जाती थीं और वे मिट्टी के बर्तनों जैसी ही मज़बूत हो जाती थीं ।
  • ऐसी पट्टी जब एक बार सूख जाती थी तो उस पर कोई नया चिह्न या अक्षर नहीं लिखा जा सकता था । इस प्रकार प्रत्येक सौदे के लिए चाहे वह कितना ही छोटा हो , एक अलग पट्टिका की जरूरत होती थी ।
  • लगभग 2600 ई.पू. के आसपास वर्ण कीलाकार हो गए और भाषा सुमेरियन थी । अब लेखन का इस्तेमाल हिसाब किताब रखने के लिए ही नहीं , बल्कि शब्द – कोश बनाने , भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने , राजाओं के कार्यों का वर्णन करने और कानून में उन परिवर्तनों को उद्घोषित करने के लिए किया जाने लगा जो देश की आम जनता के लिए बनाए जाते थे ।
  • मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन का स्थान , 2400 ई . पू . के बाद , धीरे – धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया । अक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन का रिवाज ईसवी सन् की पहली शताब्दी तक अर्थात् 2000 से अधिक वर्षों तक चलता रहा ।

 

लेखन प्रणाली

  • जिस ध्वनि के लिए कीलाक्षर या कलाकार चिह्न का प्रयोग किया जाता था वह एक अकेला व्यंजन या स्वर नहीं होता था ( जैसे अंग्रेजी वर्णमाला में m या a ) लेकिन अक्षर ( Syllables ) होते थे ( जैसे अंग्रेजी में put , या la- या in ) ।
  • इस प्रकार , मेसोपोटामिया के लिपिक को सैकड़ों चिह्न सीखने पड़ते थे और उसे गीली पट्टी पर उसके सूखने से पहले ही लिखना होता |
  • लेखन कार्य के लिए बड़ी कुशलता की आवश्यकता होती थी , इसलिए लिखने का काम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था । इस प्रकार किसी भाषा विशेष की ध्वनियों को एक दृश्य रूप में प्रस्तुत करना एक महान बौद्धिक उपलब्धि माना जाता था ।

 

साक्षरता

  • मेसोपोटामिया के बहुत कम लोग पढ़ – लिख सकते थे । न केवल प्रतीकों या चिह्नों की संख्या सैकड़ों में थी , बल्कि ये कहीं अधिक पेचीदा थे |
  • अधिकतर लिखावट बोलने के तरीके को दर्शाती थी । ” मेरे ‘ अमुक ‘ मालिक को …. उनका ‘ अमुक ‘ सेवक निवेदन करता है |

 

दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण- मंदिर और राजा

  • 5000 ई.पू. से दक्षिणी मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास होने लगा था ।
  • इन बस्तियों में से कुछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया । ये शहर कई तरह के थे । पहले वे जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए ; दूसरे जो व्यापार के केंद्रों के रूप में विकसित हुए ; और शेष शाही शहर थे ।
  • बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने अपने गाँवों में कुछ चुने हुए स्थानों या मंदिरों को बनाना या उनका पुनर्निर्माण करना शुरू किया । सबसे पहला ज्ञात मंदिर एक छोटा – सा देवालय था जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था । मंदिर विभिन्न प्रकार के देवी – देवताओं के निवास स्थान थे , जैसे उर जो चंद्र देवता था और इन्नाना जो प्रेम व युद्ध की देवी थी ।
  • ये मंदिर समय के साथ बड़े होते गए । क्योंकि उनके खुले आँगनों के चारों ओर कई कमरे बने होते थे । कुछ प्रारंभिक मंदिर साधारण घरों से अलग किस्म के नहीं होते थे क्योंकि मंदिर भी किसी देवता का घर ही होता था ।
  • देवता पूजा का केंद्र बिंदु होता था । लोग देवी – देवता के लिए अन्न , दही , मछली लाते थे आराध्य देव सैद्धांतिक रूप से खेतों , मत्स्य क्षेत्रों और स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी माना जाता था ।
  • उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया यहीं की जाती थी । घर – परिवार से ऊपर के स्तर के व्यवस्थापक , व्यापारियों के नियोक्ता , अन्न , हल जोतने वाले पशुओं , रोटी , जौ की शराब , मछली आदि के आवंटन और वितरण के लिखित अभिलेखों थे ।

मेसोपोटामिया के मंदिर के निर्माण और रखरखाव में राजाओं की भूमिका

  • जैसा कि पुरातत्त्वीय अभिलेखों से पता चलता है , मेसोपोटामिया के इतिहास में गाँव समय – समय पर पुनः स्थापित किए जाते रहे हैं । इन प्राकृतिक विपदाओं के अलावा , कई बार मानव निर्मित समस्याएँ भी आ खड़ी होती थीं । जो लोग इन धाराओं के ऊपरी इलाकों में रहते थे , वे अपने पास की जलधारा से इतना ज़्यादा पानी अपने खेतों में ले लेते थे कि धारा के नीचे की ओर बसे हुए गाँवों को पानी ही नहीं मिलता था ।
  • जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक लड़ाई चलती थी तो जो मुखिया लड़ाई जीतते थे वे अपने साथियों एवं अनुयायियों को लूट का माल बाँटकर खुश कर देते थे तथा हारे हुए समूहों में से लोगों को बंदी बनाकर अपने साथ ले जाते थे |
  • इस समय के विजेता मुखियाओं ने कीमती भेंटों को देवताओं पर अर्पित करना शुरू कर दिया जिससे कि समुदाय के मंदिरों की सुंदरता बढ़ गई । उन्होंने लोगों को उत्कृष्ट पत्थरों और धातुओं को लाने के लिए भेजा , जो देवता और समुदाय को लाभ पहुँचा सकें तथा मंदिर की धन – संपदा के वितरण का और मंदिरों में आने – जाने वाली वस्तुओं का हिसाब किताब रखकर प्रभावी तरीके से संचालन कर सकें ।
  • युद्धबंदियों ओर स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था । कृषिकर भले ही न देना पड़े , पर काम करना अनिवार्य था । जिन्हें काम पर लगाया जाता था उन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता था ।
  • एक अनुमान के अनुसार , इन मंदिरों में से एक मंदिर को बनाने के लिए 1500 आदमियों ने पाँच साल तक प्रतिदिन 10 घंटे काम किया था ।
  • शासक के हुक्म से आम लोग पत्थर खोदने , धातु खनिज लाने , मिट्टी से ईंटें तैयार करने और मंदिर में लगाने और सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे ।
  • सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्टी के शंकु ( कोन ) बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था । इन शंकुओं को भिन्न – भिन्न रंगों में रँगकर मंदिरों की दीवारों में लगाया जाता था जिससे वे दीवारें विभिन्न रंगों से सुशोभित हो जाती थीं ।

 

शहरी जीवन

  • मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार * ( Nuclear family ) को ही आदर्श माना जाता था हालांकि एक शादीशुदा बेटा और उसका परिवार अक्सर अपने माता – पिता के साथ ही रहा करते थे । पिता परिवार का मुखिया होता था ।
  • हमें विवाह की प्रक्रिया या विधि के बारे में कुछ जानकारी मिली है । विवाह करने की इच्छा के बारे में घोषणा की जाती थी और वधू के माता – पिता उसके विवाह के लिए अपनी सहमति देते थे । उसके बाद वर पक्ष के लोग वधू को कुछ उपहार देते थे | जब विवाह की रस्म पूरी हो जाती थी , तब दोनों पक्षों की ओर से उपहारों का आदान – प्रदान किया जाता था और वे एकसाथ बैठकर भोजन करते थे और फिर मंदिर में जाकर भेंट चढ़ाते थे ।
  • उर उन नगरों में से एक था जहाँ सबसे पहले खुदाई की गई थी । उसमें टेढ़ी – मेढ़ी व संकरी गलियाँ पाई गईं जिससे यह पता चलता है कि पहिए वाली गाड़ियाँ वहाँ के अनेक घरों तक नहीं पहुँच सकती थीं । अनाज के बोरे और ईंधन के गठ्ठे संभवत : गधे पर लादकर घर तक लाए जाते थे । पतली व घुमावदार गलियों तथा घरों के भू – खंडों का एक जैसा आकार न होने से यह निष्कर्ष निकलता है कि नगर नियोजन की पद्धति का अभाव था ।
  • वहाँ गलियों के किनारे जल निकासी के लिए उस तरह की नालियाँ नहीं थीं , जैसी कि उसके समकालीन नगर मोहनजोदड़ो में पाई गई हैं । बल्कि जल निकासी की नालियाँ और मिट्टी की नलिकाएँ उर नगर के घरों के भीतरी आँगन में पाई गई हैं , जिससे यह समझा जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था और वर्षा का पानी निकास नालियों के माध्यम से भीतरी आँगनों में बने हुए हौज़ों * में ले जाया जाता था ।
  • फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि लोग अपने घर का सारा कूड़ा – कचरा बुहारकर गलियों में डाल देते थे , जहाँ वह आने – जाने वाले लोगों के पैरों के नीचे आता रहता था । इस प्रकार बाहर कूड़ा डालते रहने से गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं जिसके कारण कुछ समय बाद घरों की दहलीज़ों को भी ऊँचा उठाना पड़ता था ताकि वर्षा के बाद कीचड़ बह कर घरों के भीतर न आ सके ।
  • कमरों के अंदर रोशनी खिड़कियों से नहीं , बल्कि उन दरवाज़ों से होकर आती थी जो आँगन में खुला करते थे । इससे घरों के परिवारों में गोपनीयता ( privacy ) भी बनी रहती थी ।
  • घरों के बारे में कई तरह के अंधविश्वास प्रचलित थे , जिनके विषय में उर में पाई गई शकुन – अपशकुन संबंधी बातें पट्टिकाओं पर लिखी मिली हैं |
  • सामने का दरवाज़ा अगर किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता है ; लेकिन अगर घर का लकड़ी का मुख्य दरवाज़ा ( भीतर की ओर न खुलकर ) बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पति के लिए यंत्रणा का कारण बनेगी ।
  • उर में नगरवासियों के लिए एक कब्रिस्तान था , जिसमें शासकों तथा जन साधारण की समाधियाँ पाई गईं ; लेकिन कुछ लोग साधारण घरों के फ़र्शो के नीचे भी दफ़नाए हुए पाए गए थे ।

 

पशुचारक क्षेत्र में एक व्यापारिक नगर

  • 2000 ई.पू. के बाद मारी नगर शाही राजधानी के रूप में खूब फला – फूला । मारी नगर दक्षिण के उस मैदानी भाग में स्थित नहीं हैं जहाँ खेती की पैदावार भरपूर होती थी , बल्कि वह फ़रात नदी की उर्ध्वधारा पर स्थित है । इस ऊपरी क्षेत्र में खेती और पशुपालन साथ – साथ चलते थे ।
  • पशुचारकों को जब अनाज , धातु के औज़ारों आदि की जरूरत पड़ती थी तब वे अपने पशुओं तथा उनके पनीर , चमड़ा तथा मांस आदि के बदले ये चीजें प्राप्त करते थे । बाड़े में रखे जाने वाले पशुओं के गोबर से बनी खाद भी किसानों के लिए बहुत उपयोगी होती थी । फिर भी , किसानों तथा गड़रियों के बीच कई बार झगड़े हो जाते थे ।
  • मेसोपोटामिया के कृषि से समृद्ध हुए मुख्य भूमि प्रदेश में यायावर समुदायों के झुंड के झुंड पश्चिमी मरुस्थल से आते रहते थे । ये गड़रिये गर्मियों में अपने साथ इस उपजाऊ क्षेत्र के बोए हुए खेतों में अपनी भेड़ – बकरियाँ ले आते थे । ये समूह गड़रिये , फसल काटने वाले मज़दूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में आते थे और समृद्ध होकर यहीं बस जाते थे । उनमें से कुछ ने तो अपना खुद का शासन स्थापित करने की भी शक्ति प्राप्त कर ली थी । ये खानाबदोश लोग अक्कदी , एमोराइट , असीरियाई और आर्मीनियन जाति के थे ।
  • मारी के राजा एमोराइट समुदाय के थे । उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी और उन्होंने मेसोपोटामिया के देवी – देवताओं का आदर ही नहीं किया बल्कि स्टेपी क्षेत्र के देवता डैगन ( Dagan ) के लिए मारी नगर में एक मंदिर भी बनवाया ।
  • इस प्रकार , मेसोपोटामिया का समाज और वहाँ की संस्कृति भिन्न – भिन्न समुदायों के लोगों और संस्कृतियों के लिए खुली थी और संभवतः विभिन्न जातियों तथा समुदायों के लोगों के परस्पर मिश्रण से ही वहाँ की सभ्यता में जीवन शक्ति उत्पन्न हो गई ।
  • मारी के राजाओं को सदा सतर्क एवं सावधान रहना पड़ता था ; विभिन्न जन – जातियों के चरवाहों को राज्य में चलने – फिरने की इजाज़त तो थी , परन्तु उन पर कड़ी नज़र रखी जाती थी । राजाओं तथा उनके पदाधिकारियों के बीच हुए पत्र व्यवहार में अक्सर इन पशुचारकों की गतिविधियों और शिविरों का उल्लेख किया गया है ।
  • मारी नगर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्थल पर स्थित था जहाँ से होकर लकड़ी , ताँबा , राँगा , तेल , मदिरा और अन्य कई किस्मों का माल नावों के जरिए फ़रात नदी के रास्ते दक्षिण और तुर्की , सीरिया और लेबनान के ऊँचे इलाकों के बीच लाया ले जाया जाता था ।
  • दक्षिणी नगरों को घिसाई पिसाई के पत्थर , चक्कियाँ , लकड़ी और शराब तथा तेल के पीपे ले जाने वाले जलपोत मारी में रुका करते थे , मारी के अधिकारी जलपोत पर जाया करते थे , उस पर लदे हुए सामान की जाँच करते थे ( एक नदी में 300 मदिरा के पीपे रखे जा सकते थे । ) और उसे आगे बढ़ने की इजाज़त देने से पहले उसमें लदे माल की कीमत का लगभग 10 प्रतिशत प्रभार वसूल करते थे ।
  • यद्यपि मारी राज्य सैनिक दृष्टि से उतना सबल नहीं था , परंतु व्यापार और समृद्धि के मामले में वह अद्वितीय था ।

 

लेखन कला की देन

  • संभवतः मेसोपोटामिया की दुनिया को सबसे बड़ी देन है उसकी कालगणना और गणित की विद्वत्तापूर्ण परंपरा है ।
  • 1800 ई.पू. के आसपास की कुछ पट्टिकाएँ मिली हैं जिनमें गुणा और भाग की तालिकाएँ , वर्ग तथा वर्गमूल और चक्रवृद्धि ब्याज की सारणियाँ दी गई हैं ।
  • उस समय के विद्यार्थियों को इस प्रकार के सवाल हल करने होते थे : अगर एक खेत का क्षेत्रफल इतना इतना है और वह एक अंगुल गहरे पानी में डूबा हुआ है तो संपूर्ण पानी का आयतन बताओ ।
  • पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा के अनुसार एक पूरे वर्ष का 12 महीनों में विभाजन , एक महीने का 4 हफ्तों में विभाजन , एक दिन का 24 घंटों में और एक घंटे का 60 मिनट में विभाजन- यह सब जो आज हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अचेतन हिस्सा है , मेसोपोटामियावासियों से ही हमें मिला है ।
  • जब कभी सूर्य और चंद्र ग्रहण होते थे तो वर्ष मास और दिन के अनुसार उनके घटित होने का हिसाब रखा जाता था । इसी प्रकार रात को आकाश में तारों और तारामंडल की स्थिति पर बराबर नज़र रखते हुए उनका हिसाब रखा जाता था ।
  • मेसोपोटामियावासियों की इन महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भी उपलब्धि संभव नहीं होती यदि लेखन की कला और विद्यालयों जैसी उन संस्थाओं का अभाव होता जहाँ विद्यार्थीगण पुरानी लिखित पट्टिकाओं को पढ़ते और उनकी नकल करते थे और जहाँ कुछ छात्रों को साधारण प्रशासन का हिसाब किताब रखने वाले लेखाकार न बनाकर , ऐसा प्रतिभासंपन्न व्यक्ति बनाया जाता था जो अपने पूर्वजों की बौद्धिक उपलब्धियों को आगे बढ़ा सकें ।

Leave a Comment