NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 Summary उपभोक्तावाद की संस्कृति

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 Summary उपभोक्तावाद की संस्कृति

Hindi Kshitij Chapter 3 Summary उपभोक्तावाद की संस्कृति

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 Summary उपभोक्तावाद की संस्कृति, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

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NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 Summary उपभोक्तावाद की संस्कृति

लेखक परिचय

जीवन परिचय – श्यामाचरण दुबे का जन्म सन 1922 में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ था । उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से पीएच ० डी ० की । उन्होंने भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया । वे अनेक संस्थानों के प्रमुख पदों पर भी रहे । उनकी गणना भारत के अग्रणी समाज वैज्ञानिकों में की जाती है । उनका देहांत सन 1996 में हुआ ।

रचना परिचय – उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं

मानव और संस्कृति , परंपरा और इतिहास बोध , संस्कृति तथा शिक्षा , समाज और भविष्य , भारतीय ग्राम , संक्रमण की पीड़ा , विकास का समाजशास्त्र , समय और संस्कृति ।

साहित्यिक विशेषताएँ – श्यामाचरण दुबे के लेखन में जीवन , समाज और संस्कृति के ज्वलंत विषयों पर विश्लेषण एवं तार्किक स्पष्टता दिखाई देती है । उन्होंने भारत की जनजातियों तथा ग्रामीण समुदायों पर केंद्रित अनेक लेख लिखे । इन लेखों के द्वारा उन्होंने जनमानस का ध्यान इनकी ओर खींचा है । प्रबुद्ध वर्ग ने उनके लेखों की सराहना की है ।

भाषा – शैली – उनकी भाषा – शैली अत्यंत प्रभावी है । उनकी भाषा में तत्सम , तद्भव , अंग्रेज़ी तथा उर्दू शब्दों का प्रयोग किया गया है । वे जटिल भावों- विचारों को भी तार्किक विश्लेषण के साथ सहज भाषा में प्रस्तुत करते हैं । उनकी भाषा में निरंतरता तथा प्रवाहमयता है जो पाठक को बाँधे रखती है ।

पाठ का सारांश

‘ उपभोक्तावाद की संस्कृति ‘ निबंध में समाज की उस वास्तविकता को हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है , जिसके हम वस्तुओं के गुण – दोष पर विचार किए बिना उन्हें खरीदे जा रहे हैं । आज हम वस्तुओं को विज्ञापित गुणों से भ्रमित होकर तथा उनकी चमक – दमक देखकर खरीदते हैं । आज संपन्न और अभिजात वर्ग द्वारा अपनाई जा रही जीवन – शैली से प्रभावित होकर सामान्य मनुष्य भी उन्हें पाने का प्रयास करता है । यह उपभोक्तावाद का प्रभाव है , जिससे दिखावे की प्रवृत्ति हम पर हावी हो रही है । दिखावे की इस संस्कृति के फलस्वरूप सामाजिक विषमता और अशांति बढ़ जाएगी ।

लेखक का मानना है कि उपभोक्तावाद के प्रभाव स्वरूप धीरे – धीरे हमारी जीवन – शैली बदल रही है । एक नई जीवन – शैली के साथ ही एक नया जीवन दर्शन ( उपभोक्तावाद का जीवन – दर्शन ) अपना प्रभुत्व जमाता जा रहा है । चारों ओर उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है । यह सब कुछ हमारे भोग और सुख के लिए है । आज उपभोग ही सुख बन गया है । जाने – अनजाने हमारा चरित्र भी प्रभावित हो रहा है और हम उत्पाद के वशीभूत होते जा रहे हैं ।

आज बाज़ार में हर ओर विलासिता की सामग्री हमें लुभा रही है । दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं में टूथ पेस्ट को ही लेते हैं । सभी अलग – अलग खूबियाँ बताकर उपभोक्ताओं को लुभाने पर तुले हैं । एक टूथ – पेस्ट दाँतों को चमकाता है तो दूसरा दुर्गंध हटाता है और तीसरा पूर्ण सुरक्षा देता है । किसी का मैजिक फार्मूला है तो कोई ऋषियों , मुनियों द्वारा स्वीकृत है । पेस्ट के साथ ब्रश भी अच्छा होना चाहिए । माउथ वॉश भी चाहिए । इनकी सूची लंबी होने के साथ – साथ इनका बिल भी बढ़ता जाएगा । लोग उन्हीं वस्तुओं को खरीदना पसंद करते हैं , जिनका अधिकाधिक विज्ञापनों द्वारा प्रचार – प्रसार किया जाता है । टूथ – ब्रश या सौंदर्य प्रसाधन , सभी विज्ञापन द्वारा अपनी गुणवत्ता बताते हैं ।

आज बाज़ार में अनेक प्रकार के साबुन उपलब्ध हैं । ये शरीर को साफ़ करने के साथ – साथ खुशबू लाने का काम भी करते हैं । कुछ साबुन तो गंगाजल से बने होने का भी दावा करते हैं जो शरीर और मन दोनों को पवित्र रखने की बात कहते हैं । आज एक नहीं अनेक तरह के परफ्यूम बाज़ार में उपलब्ध हैं जो शरीर को तरो – ताज़ा रखते हैं । सौंदर्य प्रसाधनों की ऐसी होड़ लगी है कि संभ्रांत महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर तीस – चालीस हज़ार की सामग्री एकत्र हो जाती है । इस मामले में पुरुष भी पीछे नहीं रहे । पहले उनका काम साबुन और तेल से चल जाता था । अब तो इस सूची में दर्जन दो दर्जन चीजें और जुड़ गई हैं । पुरुषों की सुंदरता बढ़ाने वाले अलग उत्पाद आ गए हैं । जगह – जगह डिज़ाइन के कपड़े बनाने वाले बुटीक खुल गए हैं । समय देखने के लिए पाँच सौ की घड़ी पर्याप्त है , पर आज शान दिखाने के लिए लाख – डेढ़ लाख की घड़ियाँ खरीदी जाती हैं । आज यह सब आवश्यकता पूरी करने के साधन होने के बजाए प्रतिष्ठा दिखाने के साधन बन गए हैं । महँगे म्यूजिक सिस्टम और कंप्यूटर खरीदकर लोग अपने घर की शान बढ़ाते हैं , भले ही वे उनका उपयोग करें या न करें । लोग दिखावे के लिए यह सब खरीद लेते हैं । आज खाने के लिए पाँच सितारा होटल , इलाज के लिए पाँच सितारा अस्पताल और बच्चों की शिक्षा के लिए पाँच सितारा पब्लिक स्कूल हैं । अब तो लोग अमेरिका जैसे पाश्चात्य देशों में शानदार जगहों पर शानदार ढंग से अपने अंतिम संस्कार के लिए एडवांस बुकिंग करने लगे हैं । वास्तव में ये सब बातें उपभोक्तावादी समाज का एक नमूना भर प्रस्तुत करती हैं , जिन्हें जन सामान्य भी अपनाने के लिए व्याकुल एवं आतुर हो रहा है । ऐसे में उत्पादों की गुणवत्ता में जबरदस्त गिरावट आई है । इसके अलावा जीवन – मूल्य और सामाजिक मूल्यों में भी तेजी से कमी आई है । हाँ , दिखावे की प्रवृत्ति में जबरदस्त वृद्धि हुई है ।

उपभोक्तावाद के प्रचार – प्रसार का कारण सामंती संस्कृति है । सामंती संस्कृति के तत्व भारत में पहले भी रहे हैं , पर आज सामंत बदल गए हैं । हमारी सांस्कृतिक परंपराओं का अवमूल्यन , आस्थाओं का क्षरण हुआ है । हम बौद्धिक दासता के शिकार होकर पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे हैं । हमारी सांस्कृतिक अस्मिता कमज़ोर पड़ती जा रही है । हम दिग्भ्रमित हो रहे हैं । समाज अन्य निर्देशित हो रहा है । विज्ञापन और प्रचार – प्रसार की शक्तियाँ हमें अपने वश में कर रही हैं । इस सांस्कृतिक फैलाव का परिणाम गंभीर चिंता का विषय बन गया है । इससे हमारे संसाधनों का अपव्यय हो रहा है । जीवन की गुणवत्ता न तो अंतर्राष्ट्रीय आलू के चिप्स और न ही बहुविज्ञापित शीतल पेय से सुधरती है । आधुनिक पीज़्ज़ा और बर्गर अंततः कूड़ा खाद्य ही हैं । इन सबसे समाज में अमीर – गरीब के बीच की दूरी बढ़ रही है , सामाजिक संस्कारों में कमी आ रही है । इससे आक्रोश और अशांति पनप रही है , विकास का विराट उद्देश्य नष्ट हो रहा है , मर्यादाएँ टूट रही हैं तथा नैतिक मानदंड कमज़ोर पड़ रहे हैं । मनुष्य व्यक्ति केंद्रित हो रहा है । स्वार्थ परमार्थ पर भारी पड़ रहा है । भोग की आकांक्षाएँ बढ़ती ही जा रही हैं ।

गांधी जी का कहना था हम अपनी बुनियाद पर कायम रहकर स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभाव को अपनाएँ । उपभोक्तावादी संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है जो भविष्य के लिए बड़ा खतरा है ।

पाठ के शब्दार्थ

जीवन-शैली – जीने का तरीका

वर्चस्व – प्रभुत्व , दबदबा

उपभोक्तावाद – उपभोग को ही लक्ष्य मानना

उत्पादन – कारखानों में माल ( वस्तुएँ ) तैयार करना

उत्पाद – उपभोग के लिए तैयार माल

माहौल – वातावरण

समर्पित – मन को कहीं लगाना

विलासिता – शौकीनी , आरामतलबी

निरंतर – लगातार

मैजिक – जादू

मान्य – मानी हुई

माउथ-वॉश – मुँह साफ़ रखने का तरल पदार्थ

बहुविज्ञापित – बार – बार प्रचार किया जाने वाला

जर्म्स – कीटाणु

सिने स्टार्स- अभिनेता – अभिनेत्रियाँ

निखार – चमक

संभ्रांत – धनी

परफ्यूम – सुगंधित पदार्थ ।

प्रतिष्ठा चिह्न – सम्मानसूचक चिह्न

हैसियत- सामर्थ्य , औकात

आफ्टर शेव – दाढ़ी बनाने के बाद लगाया जानेवाला तरल पदार्थ

बुटीक – कपड़े सिलने की दुकान

ट्रेंडी – जो फैशन में हो , फैशननुमा

म्यूज़िक सिस्टम – संगीत उत्पन्न करने वाला यंत्र

अंतिम संस्कार – मृत्यु के बाद की जानेवाली क्रिया

अनंत- जिसका अंत न हो

मंद ध्वनि- धीमी आवाज़

हास्यास्पद – मज़ाक उड़ाने योग्य

विशिष्ट जन- ऊँचे या संपन्न लोग

सामंती संस्कृति – राजाओं की संस्कृति

अस्मिता – अस्तित्व

अवमूल्यन – कम होना

आस्था – विश्वास

क्षरण – नाश

बौद्धिक दासता – दिमाग से गुलाम होने की आदत

अनुकरण – नकल

प्रतिमान – आदर्श

प्रतिस्पर्धा – मुकाबला

छद्म – नकली , बनावटी

गिरफ्त – कैद

नियंत्रक – वश में करनेवाला

क्षीण – कमज़ोर

दिग्भ्रमित – भटका हुआ

सीमित – थोड़ा , कम

अपव्यय – फिजूलखर्ची

खाद्य – खाने योग्य

सरोकार – लगाव , वास्ता

आक्रोश – गुस्सा

ह्रास – गिरावट

विराट – बड़ा, विशाल

झूठी तुष्टि- संतुष्ट होने का भ्रम

व्यक्ति केंद्रकता – अपने – आप तक ही सीमित रहने का भाव

परमार्थ – दूसरों की भलाई

बुनियाद – आधार

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