NCERT Class 9 Hindi Kritika Chapter 5 Summary किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

Hindi Kritika Chapter 5 Summary किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

NCERT Class 9 Hindi Kritika Chapter 5 Summary किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

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NCERT Class 9 Hindi Kritika Chapter 5 Summary किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

पाठ का सारांश

इस पाठ के माध्यम से लेखक ने बताना चाहा है कि हिंदी लेखन में कम रुचि रखने वाला लेखक किस तरह हिंदी में लिखने लगा । लेखक अपने स्वभाव के बारे में लिखता है कि वह बहुत ही संवेदनशील व्यक्ति था । उसे किसी की कही गई कटु बात से गहराई तक ठेस पहुँचती है । ऐसे ही किसी व्यक्ति ने लेखक को कुछ ऐसी बात कह दी जो उसे चुभ गई । वह इसे सह नहीं सका और जिस हालत में था , वैसे ही दिल्ली जाने वाली बस पकड़ ली । उस समय उसकी जेब में पाँच – सात रुपये ही थे । उसने यह तय कर लिया था कि कुछ न कुछ ( पेंटिंग सीखना ) हर हाल में करना है । लेखक ने दिल्ली आकर उकील आर्ट स्कूल का पता मालूम किया । संयोग कि वहाँ उसे प्रवेश मिल गया । लेखक ने करोलबाग में कमरा किराए पर ले लिया और अपनी पेंटिंग की कक्षा में नियमित रूप से जाने लगा । लेखक को पेंटिंग करने तथा कविताएँ लिखने का शौक था । वह हर वस्तु को ध्यान से देखता और कविता के तत्व खोजता । दिल्ली में रहने का उसका खर्च उसके भाई द्वारा भेजे गए रुपये तथा कुछ साइनबोर्ड की पेंटिंग आदि से चल जाता था । इस बीच लेखक काफी दुखी रहने लगा था , क्योंकि उसकी पत्नी की टी.बी. की बीमारी से मृत्यु हो चुकी थी । वह दिल्ली में अकेला तथा उदास रहता था । इसी समय लेखक के साथ महाराष्ट्र के एक पैंतीस – चालीस वर्षीय पत्रकार महोदय आकर रहने लगे । वे इलाहाबाद से बहुत लगाव रखते थे । इन्हीं दिनों लेखक ने अपने अन्य मित्र तथा बी ० ए ० के सहपाठी नरेंद्र शर्मा से भी मुलाकात की जो एम ० ए ० कर चुके थे । उस समय नरेंद्र शर्मा कांग्रेस की राजनीति करना चाहते या पत्रकारिता को कैरियर बनाना चाहते थे यह स्पष्ट नहीं था ।

एक बार बच्चन जी स्टूडियों में आए । उस समय लेखक पेंटिंग क्लास में जा चुका था । बच्चन जी संक्षिप्त सा नोट छोड़ गए । लेखक ने बच्चन जी के प्रति कृतज्ञता महसूस की । वह पत्रोत्तर देने में आलसी था । उसने कृतज्ञता प्रकट करते हुए एक सॉनेट लिखकर बच्चन जी को भेज दिया । कुछ और समय बीता । लेखक अब दिल्ली से देहरादून आ गया और अपनी ससुराल की केमिस्ट वाली दुकान पर कंपाउंडरी सीखने लगा । वह आड़ी – तिरछी रेखाओं में लिखी दवाओं का नाम पढ़ने लगा । इस बीच उसकी देहरादून में चलने वाली पेंटिंग की क्लास बंद हो गई , लेखक का मन अब फिर उदास रहने लगा । वह स्वयं को एकाकी महसूस करने लगा । गर्मियों के दिन थे । बच्चन जी अपनी छुट्टियाँ बिताने देहरादून आए थे और यहाँ ब्रजमोहन गुप्त के यहाँ ठहरे थे । ब्रजमोहन गुप्त लेखक के भाई के मित्र थे । वे ब्रजमोहन के साथ डिस्पेंसरी में आए , लेखक और एक दिन रुके भी । उसी साल देहरादून में तेज आँधी आई । बहुत बड़े – बड़े पेड़ , टिन की छतें आदि सड़कों पर आ गिरे । बच्चन जी भी इसी आँधी – पानी में फँसे थे और गिरते पेड़ के नीचे आने से बाल – बाल बचे । लेखक को लगा कि इससे बड़ा तूफ़ान तो उसकी ज़िंदगी में आ चुका था । बच्चन जी बात और वाणी के धनी थे । वे फौलाद की तरह मजबूत और मक्खन की तरह सहृदय । उन्होंने लेखक को दुखी व निराश देखा तथा लेखक को अपने साथ इलाहाबाद ले आए । उनका मानना था कि लेखक यदि देहरादून में रहा तो मर जाएगा ।

इलाहाबाद आने पर लेखक ने एम ० ए ० में दाखिला लिया । पढ़ाई तथा अन्य खर्चों के लिए बच्चन जी उसके अभिभावक बने । उन्होंने लेखक के दोनों वर्षों के खर्च को वहन किया । उन्होंने यह भी कहा कि जब कमाना तब वापस कर देना पर लेखक ने यह सब कभी वापस करने की चिंता नहीं की । लेखक अपने पिता की सरकारी नौकरी देख चुका था । इसलिए वह सरकारी नौकरी करने का इच्छुक न था । कुछ समय बाद हिंदू बोर्डिंग हाउस के कॉमनरूम में लेखक को एक फ्री सीट मिल गई और अनुवाद करने का कार्य पंत की कृपा से मिलने लगा । यह कार्य इंडियन प्रेस में था । उस समय निराला एवं पं लोकप्रिय हो रहे थे । लेखक ने भी हिंदी में गंभीरता से कविता लेखन कार्य शुरू कर दिया । मित्रों का सहयोग , इलाहाबाद का संस्कार तथा हिंदी कविता का वातावरण एवं प्रोत्साहन पाकर वह हिंदी में रचनाएँ करने लगा । 1937 से उसकी स्थिति सुधरने लगी । उसने बच्चन के निर्देशन में चौदह पंक्तियों की एक कविता लिखी । बाद में उसने बच्चन के ‘ निशा निमंत्रण ‘ जैसी कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं । लेखक का प्रयास रंग लाया । उसकी कुछ कविताएँ सरस्वती पत्रिका में छपीं साथ ही उसने कुछ निबंध भी हिंदी में लिखें । वह बच्चन जी के सदैव निकट बना रहा । लेखक का कहना है कि बच्चन जैसे लोग हमेशा ही दुनिया में हुआ करते हैं । वह बच्चन जी को असाधारण कहकर उनकी महिमा को कम नहीं करना चाहता है । यह बात अजब होते हुए भी सच है ।

पाठ के शब्दार्थ

जुमला- वाक्य , व्यंग्योक्ति

समाया – बैठा हुआ

मुख्तसर – संक्षिप्त रूप में

इम्तिहान – परीक्षा

बिला-फीस – बिना फीस के , निःशुल्क

भर्ती – दाखिल

बहमो – गुमान – भ्रम का अनुमान

प्रकाशित – जो छापा एवं प्रचारित किया गया हो

मौज – खुशी

तरंग – लहर

टीस – सी – वेदना , पीड़ा

चुनाँचे – इसलिए

गजल – उर्दू कविता

शेर – गजल के दो चरण

बगौर – गौर से , ध्यान से

आकर्षण – खिंचाव

साइनबोर्ड – विज्ञापन दर्शाने वाले बोर्ड

बेकार- रोजगारविहीन

माई वीकनेस – मेरी कमज़ोरी

उद्विग्न – अशांत

खो देना – मन बहला देना

देहांत – मृत्यु

घसीटता – लिखता

बोर होना – ऊब जाना

सहपाठी- साथ में पढ़ने वाला

संलग्न – शामिल

वसीला – ज़रिया , सहारा

कृतज्ञ – उपकार को याद रखने वाला

उपलब्धि – प्राप्ति , मिली हुई

व्यक्त करती – कहती या प्रकट करती हुई

सॉनेट – यूरोपीय कविता का एक छंद जिसका प्रयोग हिंदी कवियों ने भी किया है

छंदमुक्त – छंदों के बंधन से मुक्त कविता

गोया- मानो

केमिस्ट एवं ड्रगिस्ट- दवाइयाँ एवं रसायन बेचने वाले

कंपाउंडरी – ग्राहकों को दवा देने वाला

महारत – कुशलता

नुस्खा – इलाज के लिए लिखी गई दवाएँ

इबारत – वाक्य

एकांत – अकेला

गरज – मतलब

दिलचस्पी – रुचि , शौक

अदब लिहाज- शर्म संकोच

घुट्टी में पड़ना – स्वभाव बन जाना

एकांतिकता – एकाकीपन

अभ्यासी- आदती

खिन्न – परेशान और उदास

सामंजस्य – तालमेल

पोस्ट करना – डाक से भेजना

इत्तिफाक – संयोग

डिस्पेंसरी – दवाखाना

धूम – लोकप्रियता , प्रसिद्धि

प्रबल – कठोर , मजबूत

झंझावात – आँधी , तूफ़ान

बिछे थे – गिर पड़े थे

बाल – बाल बचना – बहुत मुश्किल से बचना

पत्नी वियोग- पत्नी की मृत्यु

अर्धांगिनी – पत्नी

भावुक – भावना से भरपूर

उत्साह – जोश

संघर्ष – टकराव , स्ट्रगल

निश्छल – छल – कपट रहित , सरल

बात का धनी – किसी बात को कहकर पूरा करने वाला

वाणी का धनी – बोलने में अत्यंत कुशल

संकल्प – इरादा , दृढ़ निश्चय

फौलाद – लोहा , अत्यंत कुशल

बरखा – बरसात

मक्खन – अत्यंत कोमल

झमाझम – मूसलाधार या बहुत तेज

मेजवान – जिसके घर अतिथि आते हैं

आग्रह – इसरार , बार-बार कहना

रवाना होना चल पड़ना

कल्पना भी न कर पाना – सोच भी न पाना

बराय नाम – नाम के लिए दिखाने को

सटीक – एकदम सही

वहम – भ्रम

एम ० ए ० – बी ० ए ० के बाद की पढ़ाई

गरीब – गुरबा – गरीबों के लिए

नुस्खा – दवाइयाँ

थ्री टाइम्स अ ‘ डे ‘ – दिन में तीन बार

दो आने – बारह पैसे

बेफिक्र – चिंतामुक्त

लोकल- स्थानीय

गार्जियन – अभिभावक

दर्ज – लिखा जाना

सूफी नज़्म – सूफी कविता

स्नेह – प्यार

अर्से – लंबे समय तक

काबिल – योग्य

प्लान – योजना

डिग्री – उपाधि

फारिंग- मुक्त

तर्क-वितर्क – बहस

हद – उच्चतम सीमा

पलायन – कहीं अन्यत्र चले जाना

सहज – स्वाभाविक

अनुवाद – एक भाषा से दूसरी भाषा में बदलना या रूपांतरित करना

गंभीरता – विशेष ध्यान देकर

रब्त – संबंध , रिश्ता

शिल्प – तौर-तरीका , शैली

फर्स्ट फार्म – प्राथमिक भाषा

खालिस – शुद्ध

भावुकता – कोमल भावनाएँ

आंतरिक – हृदय संबंधी

विषयांतर – दूसरे विषयों की ओर जाना

साहित्यिक – साहित्य संबंधी

पुनर्संस्कार – दुबारा आदत में डालना

प्रीवियस – पहली साल

मतभेद – विचारों का आपस में न मिलना

अभिव्यक्ति – मन के भावों को व्यक्त / प्रकट करना

माध्यम – साधन

पछाँही- पश्चिम से संबंधित

घेर लेना- किसी निश्चित सीमा में बाँधना

साधना – गहन अध्ययन

संस्कार – अच्छी आदतें , गुण

प्रवास – कुछ समय के लिए नए स्थान पर रहना

प्रोत्साहन – उत्साह को बढ़ाना

विरक्त – लगाव न होना

संकीर्ण – तंग , संकरा

सांप्रदायिक – किसी संप्रदाय विशेष को बढ़ावा देने वाला

मर्दानावार – बहादुर पुरुषों की तरह

उच्च घोष – ऊँचे स्वर में

सांस्कृतिक – संस्कृति संबंधी

हीन-संकुचित – तुच्छ एवं अत्यंत छोटी

मनः स्थिति – मनोदशा

द्योतक – प्रतीक , परिचायक

अंतश्चेतना – अंतर्मन में , हृदय में

कमर कस लेना- तैयार हो जाना

भाव मात्र- केवल यही भाव

स्टैंजा – स्थाई या टेक को छोड़कर गीत का चरण या अंतरा

विन्यास – व्यवस्थित करना

अतुकांत – तुकांतरहित

रूप-प्रकार – शक्ल – सूरत

आकृष्ट – आकर्षित

संशोधन – सुधार कार्य

अप्रकाशित – जो प्रकाशित न हो सकी हो

सुरक्षित – बचाए हुए , सँभालकर रखे हुए

क्षोभ – असंतोष , दुख

निरर्थक – उद्देश्यहीन , बेकार

आकृष्ट – आकर्षित किया गया

प्रारंभिक – शुरुआती

प्रांगण – आँगन

घसीट लाए – जबरदस्ती खींच लाए

सजग – जागी हुई , जागृत

प्रातिभ – प्रतिभायुक्त

नैसर्गिक – स्वाभाविक

क्षमता – सामर्थ्य

बेसिकली – आधारभूत

व्यवधान- रुकावट , बाधा

आँकना – अनुमान लगाना , आँकलन करना

असाधारण – विशिष्ट , असामान्य

मर्यादा – शान

दुष्प्राप्य – कठिनाई से प्राप्त होने वाला

अजब – विचित्र , अजीब

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