Class 9 Hindi Sparsh Chapter 6 Summary कीचड़ का काव्य

Hindi Sparsh Chapter 6 Summary कीचड़ का काव्य

Class 9 Hindi Sparsh Chapter 6 Summary कीचड़ का काव्य, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT Summary for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

Class 9 Hindi Sparsh Chapter 6 Summary कीचड़ का काव्य

 

पाठ का सार

‘ कीचड़ का काव्य ‘ काका कालेलकर द्वारा रचित ललित निबंध है । इसमें लेखक ने कीचड़ का महत्त्व दर्शाया है । लेखक के अनुसार इसे तुच्छ कहकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता ।

लेखक प्रातः काल के दृश्य का वर्णन करते हुए कहता है कि उस समय पूर्व दिशा तो कुछ विशेष आकर्षक नहीं थी , पर उत्तर में रंग की सारी शोभा जमी हुई थी । इस दिशा में लाल रंग कमाल कर रहा था , परंतु यह सौंदर्य थोड़े समय के लिए था । देखते – देखते वह बादल सफेद रंग का हो गया और दिन का क्रम आरंभ हो गया । लेखक बताता है कि हम आकाश , पृथ्वी और तालाबों का तो खूब वर्णन करते हैं , पर कीचड़ का वर्णन कोई नहीं करता । ऐसा क्यों है ? कीचड़ में पैर डालना कोई पसंद नहीं करता , क्योंकि कीचड़ से शरीर गंदा होता है , कपड़े मैले होते हैं । कीचड़ के लिए किसी के दिल में सहानुभूति नहीं होती । पर यदि हम निष्पक्ष भाव से सोचें तो हमें पता चलेगा कि कीचड़ में भी काफ़ी सौंदर्य होता है । लेखक इसका कारण बताते हुए कहता है कि कीचड़ का रंग सुंदर होता है । हम पुस्तकों पर गत्ते का रंग , घरों की दीवारों का रंग अथवा कीमती कपड़ों का रंग कीचड़ जैसा पसंद करते हैं । कलाविज्ञों को भी भट्टी में पकाए मिट्टी के बर के लिए यही रंग पसंद आता है । फोटो में भी इस रंग की झलक अच्छी लगती है । पर पता नहीं क्या कारण है कि कीचड़ का नाम लेते ही लोगों का मूड बिगड़ जाता है । नदी के किनारे जब कीचड़ सूख जाता है तब उसके टुकड़े हो जाते हैं और वे बहुत सुंदर लगते हैं । ज्यादा गरमी के कारण इनमें दरारें पड़ जाती हैं और वे टेढ़े दिखाई देते हैं । में ये सुखाए खोपरे जैसे लगते हैं । नदी के किनारे की कीचड़ का दृश्य भी कम सुंदर नहीं लगता । कीचड़ का पृष्ठ कुछ सूख जाता है , तब उस पर बगुले चलते हैं । उनके तीखे नाखून आगे और अँगूठा पीछे होता है । उनके पैरों के निशान हमें भी कारवाँ में जाने को प्रेरित करते हैं ।

जब कीचड़ ज्यादा सूख जाता है तब जमीन ठोस हो जाती है । उस समय गाय , बैल , पाड़े , भैंस , भेड़ , बकरे उस पर अपने पैरों के निशान बनाते हैं । उसकी शोभा देखते ही बनती है । भैंसों और पाड़ों की लड़ाई के दौरान उनके पैरों और सींगों के चिह्न भी भारतीय युद्ध कला का दृश्य याद दिला देते हैं । कीचड़ को देखने के लिए गंगा किनारे या सिंधु किनारे जाना चाहिए । यदि इतने से संतुष्टि न हो तो सीधे खंभात तक जा पहुँचना चाहिए । वहाँ मही नदी के मुँह के आगे जहाँ नजर जाती है , वहाँ तक कीचड़ ही कीचड़ दिखाई देती है । इस कीचड़ में पहाड़ के पहाड़ गायब हो जाते हैं । यदि मनुष्य के ध्यान में यह बात रहती कि वह जो अन्न खाता है , वह कीचड़ में ही उत्पन्न होता है तो वह कभी कीचड़ की उपेक्षा न करता । हम ‘ पंक ‘ अर्थात् कीचड़ से तो घृणा करते हैं , पर ‘ पंकज ‘ अर्थात् कमल शब्द सुनते ही हमारा मन पुलकित हो जाता है । यह पंकज ( कमल ) पंक ( कीचड़ ) में ही उत्पन्न होता है । कवियों की चित् के बारे में भी कुछ कहना कठिन है । उनके पास हर बात के लिए तर्क है । वे कहते हैं कि पंकज अच्छा लगता है तो इसका मतलब यह नहीं कि हमें ‘ पंक ‘ अच्छा लगे । हम वासुदेव की पूजा करते हैं , पर वसुदेव की तो पूजा नहीं करते । हीरे को बहुमूल्य मान पर कोयला या पत्थर का अधिक मूल्य नहीं देते ( भले ही दोनों हीरा और कोयला कार्बन के ही रूप हैं । ) मोती को गले बाँधकर घूमते हैं पर उसकी माँ ( सीपी ) को गले में नहीं बाँधते । एक अच्छी वस्तु से संबंधित अन्य चीजों को सम्मान मिलना ज़रूरी नहीं है । अतः लेखक कवियों से इस विषय पर कोई चर्चा न करना ही बेहतर समझता है ।

पाठ के शब्दार्थ

आकर्षक – प्रभावित करनेवाला

शोभा- सुंदरता

कमाल – अद्भुत

पूनी – धुनी हुई रूई की बड़ी बत्ती जो सूत कातने के लिए बनाई जाती है

यथाक्रम – क्रम के अनुसार

जलाशय – तालाब

सहानुभूति – दया

यथार्थ- सच

तटस्थता – निष्पक्षता

कलाभिज्ञ – कला के जानकार

ठीकरा – मिट्टी के बर्तन का टूटा हुआ टुकड़ा

विज्ञ – जानकार

खोपरा – नारियल का बना हुआ खप्पर

समतल – जिसका तल बराबर हो

अंकित – चिह्नित

कारवाँ – पैदल यात्रियों का झुंड

मदमस्त – नशे में चूर

पाड़े – भैंस के नर बच्चे

महिषकुल- भैंसों का परिवार

कर्दम – कीचड़

भास – प्रतीत

तृप्ति – आवश्यकता पूरी होने पर मिलनेवाली मानसिक शांति

सनातन – सदा रहनेवाला

अल्पोक्ति – छोटा कथन ।थोड़ा कहना

लुप्त – गायब

तिरस्कार – अपमान । उपेक्षा

घृणास्पद – घृणा योग्य

मलिन – मैला

आह्लादकत्व- प्रसन्नता का भाव

युक्तिशून्य – विचारहीन

वृत्ति – तरीका

वासुदेव – कृष्ण

वसुदेव – कृष्ण के पिता

कंठ – गला

मातुश्री – माँ

उत्तम – शुभ

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