NCERT Class 10 Kshitij Chapter 8 Poem Explanation कन्यादान

NCERT Class 10 Kshitij Chapter 8 Poem Explanation कन्यादान

Kshitij Chapter 8 Poem Explanation कन्यादान

NCERT Class 10 Kshitij Chapter 8 Poem Explanation कन्यादान, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT poem explanation for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

NCERT Class 10 Hindi Kshitij Chapter 8 Dohe Explanation कन्यादान

 

पाठ की रूपरेखा

प्रस्तुत कविता में स्त्री जीवन के प्रति कवि की गहरी संवेदनशीलता प्रकट हुई है । कवि ने ‘ स्त्री ‘ के लिए ‘ कोमलता ‘ के गौरव में छिपी ‘ कमज़ोरी ‘ के उपहास का विरोध किया है ।

कविता में कोरी भावुकता नहीं , बल्कि माँ के संचित अनुभवों की पीड़ा की प्रामाणिक अभिव्यक्ति है ।

माँ अपनी भोली – भाली , निश्छल हृदय और अनुभवशून्य बेटी को स्त्री जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों के प्रति सचेत करती हुई आदर्शीकरण का प्रतिकार करने की सीख दे रही है । इस कविता में स्त्री जीवन को दुःखमय बनाने वाली कुरीतियों को भी उजागर किया गया है ।

 

काव्यांशों का भावार्थ

काव्यांश 1

कितना प्रामाणिक था उसका दुःख

लड़की को दान में देते वक्त

जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो

लड़की अभी सयानी नहीं थी

अभी इतनी भोली सरल थी

कि उसे सुख का आभास तो होता था

लेकिन दुःख बाँचना नहीं आता था

पाठिका थी वह धुँधले प्रकाश की

कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

शब्दार्थ

प्रामाणिक – सच्चा / वास्तविक

वक्त – समय

पूँजी – धन

सयानी- समझदार

आभास – महसूस होना / प्रतीत होना

बाँचना – कहना / पढ़ना / समझना

पाठिका – पढ़ने वाली

धुँधला – अस्पष्ट / ठीक से न दिखाई देने वाला

लयबद्ध – लय से भरी हुई

भावार्थ – प्रस्तुत कविता में कन्यादान के समय माँ अपनी बेटी को स्त्री के परंपरागत आदर्श रूप से हटकर सीख दे रही है । इसमें कोरी भावुकता नहीं , बल्कि माँ के संचित अनुभवों की पीड़ा की प्रामाणिक अभिव्यक्ति हुई है । जब माँ ने अपनी बेटी के विवाह के समय उसे विदा किया , तो उसे लगा कि वह अपनी अंतिम पूँजी किसी को सौंप रही है ।

उस समय उसका दुःख स्वाभाविक था , क्योंकि बेटी माँ से ही अपने सुख – दुःख की बात कहती है । माँ दुःखी इसलिए थी , क्योंकि उसकी पुत्री अभी बहुत सयानी नहीं हुई थी । उसमें संसार की चालाकी को समझने की समझ नहीं थी । उसे ससुराल पक्ष की कठोर सच्चाइयों का और पुरुष – प्रधान समाज के बंधनों का ज्ञान नहीं था । उसमें इतनी सरलता तथा भोलापन था कि उसे सुख क्या है यह तो पता था , किंतु दुःख किसे कहते हैं , यह नहीं पता । वह तुकों और लय से बँधी काव्य – पंक्तियों को पढ़ना जानती थी । आशय यह है कि उसे विवाह के केवल सुरीले और मोहक पक्ष का पता था और वह केवल काल्पनिक सुखों में जीती थी ।

काव्यांश 2

माँ ने कहा पानी में झाँककर

अपने चेहरे पर मत रीझना

आग रोटियाँ सेंकने के लिए है

जलने के लिए नहीं

वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह

बंधन हैं स्त्री जीवन के

माँ ने कहा लड़की होना

पर लड़की जैसी दिखाई मत देना ।

शब्दार्थ

रीझना – प्रसन्न होना

आभूषण – गहने

शाब्दिक भ्रम – शब्दों का भ्रम / शब्दों द्वारा फैलाया गया संदेह

बंधन – बेड़ियाँ / रुकावटें

भावार्थ – प्रस्तुत कविता में माँ अपनी बेटी को स्त्री के परंपरागत आदर्श रूप से हटकर सीख देते हुए कहती है कि बेटी जब तुम पानी में देखो तो अपने सौंदर्य पर प्रसन्न मत होने लगना , साथ ही आग से भी सावधान रहना । जिस आग से रोटियाँ सेंकी जाती हैं , वही आग जलाने का कार्य भी करती है । अत : अपने जीवन के प्रति सदा सचेत रहना । इतना ही नहीं , माँ अपनी बेटी को आभूषणों के प्रति स्त्री मोह की कमज़ोरी की सच्चाई का ज्ञान कराते हुए यह भी कहती है कि तुम वस्त्रों और आभूषणों के मोह में मत पड़ना ।

ये तो दूसरों के द्वारा किए गए प्रशंसात्मक शब्दों की तरह हैं , जो स्नेह का आभास दिलाकर तुम्हें बंधन में जकड़ लेंगे । ससुराल में रहकर तुम लड़की की तरह मर्यादा भरा आचरण करना , लेकिन एक सामान्य और कमज़ोर लड़की की तरह किसी के अत्याचार को सहकर दुर्बल मत बनना ।

तुम हमेशा अपने प्रति होने वाले अत्याचार एवं शोषण का साहसपूर्वक विरोध करना , ताकि लड़की को कभी कमज़ोर न समझा जा सके । माँ ने अपनी लड़की को सलाह दी – तू मन से लड़की की तरह भोली सरल और निश्छल रहना , परंतु लोक व्यवहार में सावधान रहना । अपनी सरलता प्रकट न होने देना , वरना लोग तुझे मूर्ख बनाकर तेरा शोषण करेंगे ।

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