NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 11 Summary सवैये

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 11 Summary सवैये

Hindi Kshitij Chapter 11 Summary सवैये

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 11 Summary सवैये, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided step-by-step NCERT Summary for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

 

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 11 Summary सवैये

 

कवि परिचय

जीवन परिचय – कृष्ण भक्त कवि रसखान का जन्म सन 1548 में दिल्ली के निकट हुआ था । उनका मूल नाम सै इब्राहिम था । मुसलमान होने पर भी उनकी कृष्ण में गहरी आस्था थी । उनकी कृष्ण – भक्ति से प्रभावित होकर गोस्वामी विट्ठलदास ने उनको शिष्य बना लिया । कहा जाता है कि श्रीनाथ के मंदिर में उनको श्री कृष्ण के साक्षात दर्शन हुए , तब से वे ब्रजभूमि में ही बस गए । उनकी मृत्यु सन 1628 के आस – पास हुई थी ।

रचना परिचय – उनकी दो रचनाएँ प्राप्त हुई हैं- ( i ) प्रेमवाटिका ( ii ) सुजान रसखान । उनकी रचनाओं का संग्रह रसखान रचनावली नाम से प्रसिद्ध है ।

साहित्यिक विशेषताएँ – कृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा रखनेवाले रसखान ने कृष्णभक्ति को अपने काव्य का विषय बनाया है । वे कृष्ण से संबंधित प्रत्येक वस्तु चाहे वह जड़ हो या चेतन , सब पर मुग्ध थे । उनके काव्य में समूची ब्रजभूमि के प्रति अनुराग प्रकट हुआ है । उनका कृष्ण के प्रति प्रेम पवित्र , निश्छल और निःस्वार्थ है , जिसमें उनकी तन्मयता , भक्ति , भावुकता और तल्लीनता दर्शनीय है ।

भाषा – शैली – रसखान ने ब्रजभाषा में काव्य – रचना की है , जिसमें सरलता , सरसता तथा मधुरता का गुण विद्यमान है । भाषा में मुहावरों के प्रयोग के कारण मधुरता बढ़ जाती है । वे दोहा , कविता , और सवैया तीनों छंदों पर अधिकार रखते हैं , पर उनके सवैये अद्वितीय हैं । उन्हें देखकर रसखान को रस की खान कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

 

कविता परिचय

रसखान द्वारा रचित सवैयों में कृष्ण और उनकी लीला भूमि वृंदावन की प्रत्येक वस्तु के प्रति लगाव प्रकट हुआ है । कवि श्री कृष्ण के काले कंबल पर तीनों लोकों का सुख त्यागने को तैयार है । तीसरे सवैये में कृष्ण के रूप सौंदर्य पर मुग्ध गोपियाँ स्वयं कृष्ण रूप धारण करना चाहती हैं और चौथे सवैये में कृष्ण की बाँसुरी की धुन की मादकता तथा गोपियों की विवशता का सजीव चित्रण हुआ है ।

 

भावार्थ

1. मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।

जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ।।

पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन ।

जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन ।।

शब्दार्थ –

मानुष – मनुष्य

बसौं – बसूँ , रहूँ

ग्वारन – ग्वाल – बाल

कहा बस – वश में नहीं होना

चरौं – चरूँ

नित – हमेशा

धेनु – गाय

मँझारन – बीच में

पाहन – पत्थर

गिरि – पर्वत

छत्र – छाता

पुरंदर – इंद्र

धारन – धारण किया

खग – पक्षी

बसेरो — निवास करूँ

कालिंदी – यमुना

कूल – किनारा

कदंब – एक वृक्ष

डारन – शाखाएँ , डालें

भावार्थ – कृष्ण की लीला भूमि ब्रज के प्रति अपना लगाव प्रकट करते हुए कवि कहता है कि अगले जन्म में यदि मैं मनुष्य बनूँ तो गोकुल गाँव के ग्वाल- बालों के बीच ही निवास करूँ । यदि मैं पशु बनूँ , जिसमें मेरा कोई ज़ोर ( वश ) नहीं है, फिर भी मैं नंद बाबा की गायों के बीच चलें । यदि मैं पत्थर बनूँ तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनूँ , जिसे कृष्ण ने अपनी उँगली पर उठाकर लोगों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था । यदि मैं पक्षी बनूँ तो उसी कदंब के पेड़ पर बसेरा बनाऊँ जो यमुना के किनारे है तथा जिसके नीचे श्री कृष्ण रास रचाया करते थे ।

2. या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं ।

आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं ।।

रसखान कबौं इन आँखिन सौं , ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं ।

कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं । ।

शब्दार्थ –

या – इस

लकुटी – लाठी

कामरिया – छोटा कंबल

तिहूँ – तीनों

पुर – नगर , लोक

तजि डारौं – छोड़ दूँगा

नवौ निधि – नौ निधियाँ

बिसारौं – भूलूँगा

कबौं – जब से

सौं- से

तड़ाग – तालाब

निहारौं – देखूँगा

कोटिक – करोड़ों

कालधौत – सोना

धाम – भवन

करील – एक प्रकार का वृक्ष

कुंजन – लताओं का घर

वारौं – न्योछावर करूँगा

भावार्थ – कृष्ण से जुड़ी वस्तुओं के प्रति प्रेम प्रकट करते हुए कवि कहता है कि जिस लाठी और कंबल को लेकर कृष्ण गाय चराया करते थे , उसके बदले मैं तीनों लोकों का सुख त्यागने को तैयार हूँ । मैं नंद की गायों को चराने के बदले आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख भी भूल सकता हूँ । मैं ब्रजभूमि पर स्थित बागों , वनों , तालाबों को देखते रहना चाहता हूँ । मैं इन करील के कुंजों में रहने के बदले हज़ारों सोने के महलों का सुख त्यागने को तैयार हूँ ।

3. मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं , गुंज की माल गरें पहिरौंगी ।

ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारिन संग फिरौंगी ।।

भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी ।

या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी ।।

शब्दार्थ-

मोरपखा- मोर के पंखों से बना मुकुट

राखिहौं – रखूँगी

गुंज – एक जंगली पौधे का छोटा – सा फल

गरें – गले में

पहिरौंगी – पहनूँगी

पितंबर ( पीतांबर ) – पीला वस्त्र

गोधन – गाय रूपी धन

ग्वारिन – ग्वालिन

फिरौंगी- फिरूँगी

भावतो – अच्छा लगना

वोहि – जो कुछ

स्वाँग – रूप धारण करना

मुरलीधर – कृष्ण

अधरा – होंठों पर

धरौंगी – रखूँगी

भावार्थ – कृष्ण के सौंदर्य पर मुग्ध एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी ! मैं कृष्ण की तरह ही अपने सिर पर मोर के पंखों का मुकुट तथा गले में गुंज की माला पहनूँगी । मैं पीले वस्त्र धारण कर श्री कृष्ण की तरह ही गायों के पीछे लाठी लेकर वन – वन फिरूँगी । मेरे कृष्ण को जो भी अच्छा लगता है , वह सब कुछ करने को तैयार हूँ , पर हे सखी ! कृष्ण की उस मुरली को मैं अपने होंठों पर कभी भी न रखूँगी । क्योंकि उस मुरली ने ही कृष्ण को हमसे दूर कर रखा ।

4. काननि दै अँगुरी रहिबो जबहीं मुरली धुनि मंद बजैहै ।

मोहनी तानन सों रसखानि अटा चढ़ि गोधन गैहै तौ गैहै ।।

टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि काल्हि कोऊ कितनो समुझहै ।

माइ रीवा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै , न जैहै , न जैहै ।।

शब्दार्थ –

काननि – कानों में

दै- देकर

अँगुरी – उँगली

रहिबो – रहूँगी

धुनि – धुन

मंद – मधुर स्वर में

बजैहै – बजाएँगे

मोहनी – मोहनेवाली

तानन सों- तानों , धुनों

अटा- अटारी , अट्टालिका

गोधन – ब्रजक्षेत्र में गाया जानेवाला लोकगीत

गैहै— गाएँगे

टेरि – पुकारकर बुलाना

सिगरे – सारे

काल्हि – कल

समुझेहै- समझाएँगे

माइ री – हे माँ

वा – वह , उसके

सम्हारी – सँभाली

न जैहै- नहीं जाएगी

भावार्थ – श्री कृष्ण की मुरली की ध्वनि तथा उनकी मुस्कान पर मोहित एक गोपी कहती है कि जब श्री कृष्ण मधुर स्वर में मुरली बजाएँगे तब मैं अपने कानों में अंगुली डाल लूँगी ताकि मैं उसे न सुन सकूँ । ऊँची – ऊँची अट्टालिकाओं पर चढ़कर कृष्ण गोधन गाते हैं तो गाते रहें , मैं उससे बेअसर रहूँगी । मैं ब्रज के लोगों से चिल्लाकर कहना चाहती हूँ कि कल को मुझे कोई कितना भी समझाए पर श्री कृष्ण की एक मुस्कान पर मैं अपने वश में नहीं रह सकूँगी । मुझ पर उस मुस्कान का जादू अवश्य चल जाएगा ।

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