NCERT Class 10 Sparsh Chapter 2 Poem Explanation पद

NCERT Class 10 Sparsh Chapter 2 Poem Explanation पद

Sparsh Chapter 2 Poem Explanation पद

NCERT Class 10 Sparsh Chapter 2 Poem Explanation पद, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT poem explanation for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

NCERT Class 10 Hindi Sparsh Chapter 2 Poem Explanation पद

 

पाठ की रूपरेखा

प्रस्तुत पद ‘ मीरा ‘ के आराध्य देव ‘ श्रीकृष्ण ‘ को संबोधित हैं । पहले पद में मीरा ने श्रीकृष्ण को अपना संरक्षक मानकर उनसे प्रार्थना की है कि मेरे कष्टों को भी दूर करके मेरी रक्षा करो । दूसरे पद में मीरा , श्रीकृष्ण के समीप सेविका बनकर रहना चाहती हैं , ताकि वह सुबह उठकर प्रभु कृष्ण के दर्शन कर सकें । वह दिन – रात उनका स्मरण करते हुए , उनकी लीलाओं का गुणगान करते हुए भगवान की आराधना ( भक्ति ) में लीन हो जाना चाहती हैं । तीसरे पद में मीरा ने श्रीकृष्ण के रूप – सौंदर्य का वर्णन किया है । वह श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए इतनी व्याकुल हैं कि कृष्ण को यमुना नदी के किनारे दर्शन देने के लिए पुकारती हैं । इस प्रकार इन सभी पदों में मीरा अपने आराध्य देव से मनुहार भी करती हैं , लाड़ भी लड़ाती और अवसर आने पर उलाहना देने से भी नहीं चूकतीं । वह उनकी क्षमताओं का गुणगान करती हैं , तो उन्हें उनके कर्तव्य याद दिलाने में भी देर नहीं लगाती हैं ।

 

काव्यांशों की व्याख्या

काव्यांश 1

हरि आप हरो जन री भीर ।

द्रोपदी री लाज राखी , आप बढ़ायो चीर ।

भगत कारण रूप नरहरि , धर्यो आप सरीर ।

बूढ़तो गजराज राख्यो , काटी कुण्जर पीर ।

दासी मीराँ लाल गिरधर , हरो म्हारी भीर ।।

शब्दार्थ

हरि – श्रीकृष्ण

हरो- दूर करो

जन री – सेवक की ( मीरा की )

भीर – पीड़ा

द्रोपदी री लाज राखी – दुर्योधन द्वारा दुःशासन से द्रौपदी का चीरहरण कराने पर श्रीकृष्ण ने चीर ( द्रौपदी की साड़ी ) को बढ़ाते – बढ़ाते इतना बढ़ा दिया कि दुःशासन थक गया

बढ़ायो – बढ़ाना

चीर- वस्त्र

भगत- भक्त , सेवक

धर्यो- धारण किया

बूढ़तो- डूबते हुए

गजराज – ऐरावत हाथी

राख्यो- रक्षा की, बचाया

काटी कुञ्जर पीर – हाथी का कष्ट दूर करने के लिए मगरमच्छ को मारा

लाल गिरधर – श्रीकृष्ण

म्हारी – मेरी

पीर – दुःख

भावार्थ – मीराबाई अपने आराध्य देव से प्रार्थना करती हैं कि हे ईश्वर ! केवल आप ही अपनी इस दासी के कष्टों को दूर कर सकते हैं । आपने ही द्रौपदी की लाज बचाकर उसे अपमानित होने से बचाया था । जिस समय दुःशासन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया था , तब आपने ही उसके चीर को बढ़ाया था । इसी प्रकार अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद को बचाने के लिए आपने भगवान नरसिंह का रूप धारण किया था । आपने ही डूबते हुए हाथी को मगरमच्छ के मुँह से बचाकर उसके जीवन की रक्षा की थी और उसकी पीड़ा को दूर किया था । दासी मीरा प्रार्थना करती है कि हे गिरिधर ! आप मेरे कष्टों को भी दूर कर मुझे ( आपकी दासी मीरा को ) भी हर प्रकार के सांसारिक बंधन से छुटकारा दिला दीजिए ।

काव्य सौंदर्य

( i ) सरल एवं सहज भाषा का प्रयोग हुआ है , जो अत्यधिक प्रभावोत्पादक है ।

( ii ) इसमें ब्रजभाषा के शब्दों के साथ – साथ राजस्थानी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है ।

( iii ) ‘ काटी कुण्जर ‘ में अनुप्रास अलंकार है , जबकि पूरे पद में दृष्टांत अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( iv ) गेयात्मक या गीतात्मक शैली का प्रयोग हुआ है तथा प्रत्येक पंक्ति का अंतिम शब्द ( पद ) तुकांत है ।

काव्यांश 2

स्याम म्हाने चाकर राखो जी ,

गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी ।

चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ ।

बिन्दरावन री कुंज गली में , गोविंद लीला गास्यूँ ।

चाकरी में दरसण पास्यूँ , सुमरण पास्यूँ खरची |

भाव भगती जागीरी पास्यूँ , तीनूं बाताँ सरसी ।

शब्दार्थ

स्याम – श्रीकृष्ण

म्हाने – मुझे

चाकर – नौकर , दासी , सेवक

राखो जी – रख लीजिए

रहस्यूँ – रहूँगी

बाग लगायूँ – बाग लगाऊँगी

नित – प्रतिदिन

दरसण – दर्शन ,

पास्यूँ – करुँगी , पाऊँगी

बिन्दरावन री – वृंदावन की

कुंज – बाग

लीला – विभिन्न कार्य

गास्यूँ – गाऊँगी

चाकरी – नौकरी

सुमरण – स्मरण

खरची- जेब खर्च

भाव भगती – भावों से भरी भक्ति

जागीरी – संपत्ति, साम्राज्य

सरसी – पूर्ण होंगी

भावार्थ – मीरा , श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि हे श्याम ! तुम मुझे अपनी दासी ( सेविका ) बनाकर रख लो । मीरा , श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हुई दोबारा कहती हैं । हे गिरिधारी लाल ! तुम मुझे अपने यहाँ सेविका के रूप में रख लो । मैं तुम्हारी सेविका के रूप में रहते हुए तुम्हारे लिए बाग – बगीचे लगाया करूँगी , जिसमें तुम घूम सको । जब तुम रोज़ सुबह यहाँ घूमने आओगे , तो मैं तुम्हारे दर्शन कर लिया करूँगी । मैं वृंदावन के बागों और गलियों में तुम्हारी लीलाओं के गीत गाया करूँगी । तुम्हारी सेवा करते हुए मुझे तुम्हारे दर्शन करने का अवसर भी मिल जाएगा । तुम्हारे नाम – स्मरण के रूप में मुझे जेब – खर्च भी प्राप्त हो जाया करेगा । इस प्रकार मुझे तुम्हारे दर्शन , स्मरण और भक्ति रूपी जागीर तीनों आसानी से मिल जाएँगी , जिससे मेरा जीवन सफल हो जाएगा ।

काव्य सौंदर्य

( i ) मुख्यत : राजस्थानी भाषा के शब्दों का प्रयोग हुआ है , जो भावों की अभिव्यक्ति में पूर्णतः सक्षम हैं ।

( ii ) ‘ भाव भगती में अनुप्रास अलंकार विद्यमान है ।

( iii ) संपूर्ण पद में माधुर्य गुण विद्यमान है ।

( iv ) इसमें गेयात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।

काव्यांश 3

मोर मुगट पीताम्बर सौहे , गल वैजन्ती माला ।

बिन्दरावन में धेनु चरावे , मोहन मुरली वाला ।

ऊँचा ऊँचा महल बणावं बिच बिच राखूँ बारी ।

साँवरिया रा दरसण पास्यूँ , पहर कुसुम्बी साड़ी ।

आधी रात प्रभु दरसण , दीज्यो जमनाजी रे तीरां ।

मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर , हिवड़ो घणो अधीरौँ ।

शब्दार्थ

मोर मुगट – मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट

पीतांबर – पीले वस्त्र

सौहे- सुशोभित हो रहे हैं

गल- गले में

वैजन्ती माला- वन में उगने वाले एक प्रकार के फूलों की माला

धेनु – गाय

बणावं –बनाऊँ

बिच बिच – बीच – बीच में

बारी – फुलवारी , फूलों की छोटी – सी क्यारी

साँवरिया – श्रीकृष्ण , जिन्हें उनके साँवले रंग के कारण साँवरिया भी कहा जाता है

रा – का

पहर – पहनकर

कुसुम्बी – लाल रंग वाली

दीज्यो- दे दिया

तीरा- किनारे

नागर- चतुर

हिवड़ो- हृदय में

घणो – बहुत

अधीराँ – व्याकुलता , बेचैनी

भावार्थ – मीराबाई , श्रीकृष्ण के रूप – सौंदर्य पर अत्यंत मोहित हैं । वह उनके रूप – सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहती हैं कि श्रीकृष्ण के माथे पर मोरपंखों से बना हुआ सुंदर मुकुट सुशोभित हो रहा है । उनके शरीर पर पीले वस्त्र शोभा पा रहे हैं । उनके गले में फूलों की वैजन्ती माला बहुत सुंदर लग रही है । मन को मोहित कर लेने वाले और मधुर मधुर बाँसुरी बजाने वाले श्रीकृष्ण वृंदावन में गाय चराते हैं । वृंदावन में मेरे श्रीकृष्ण का भव्य और ऊँचा महल है । मैं इस महल के बीचों – बीच सुंदर फूलों से सजी फुलवारी बनवाऊँगी । इसके पश्चात् मैं लाल रंग की साड़ी पहनूँगी और अपने साँवले के दर्शन करूंगी । मीरा , श्रीकृष्ण से निवेदन करती हैं कि हे प्रभु ! तुम आधी रात को यमुना नदी के किनारे अपने दर्शन देने के लिए अवश्य आना , क्योंकि मेरा मन तुम्हारे दर्शन के लिए अत्यंत व्याकुल हो रहा है ।

काव्य सौंदर्य

( i ) इसमें मुख्यत : राजस्थानी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है , जो भावाभिव्यक्ति में पूर्णत : सक्षम हैं ।

( ii ) संपूर्ण पद में माधुर्य गुण विद्यमान है ।

( iii ) इस पद में गेयात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।

( iv ) ‘ मोर मुगट ‘ तथा ‘ मोहन मुरली ‘ में अनुप्रास अलंकार विद्यमान है ।

Leave a Comment