NCERT Class 10 Kshitij Chapter 1 Dohe Explanation पद

NCERT Class 10 Kshitij Chapter 1 Dohe Explanation पद

Kshitij Chapter 1 Dohe Explanation पद

NCERT Class 10 Kshitij Chapter 1 Dohe Explanation पद, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT poem explanation for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

NCERT Class 10 Hindi Kshitij Chapter 1 Dohe Explanation पद

पाठ की रूपरेखा

सूरदास द्वारा रचित ‘ सूरसागर ‘ के ‘ भ्रमरगीत ‘ से यहाँ चार पद लिए गए हैं । श्रीकृष्ण ने मथुरा जाकर गोपियों को कोई संदेश नहीं भेजा , जिस कारण गोपियों की विरह वेदना और बढ़ गई । श्रीकृष्ण ने अपने मित्र उद्धव के माध्यम से गोपियों के पास निर्गुण ब्रह्म एवं योग का संदेश भेजा , ताकि गोपियों की पीड़ा को कम किया जा सके । गोपियाँ श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं , इसलिए उन्हें निर्गुण ब्रह्म एवं योग का संदेश पसंद नहीं आया । तभी एक भौंरा यानी भ्रमर उड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा , गोपियों ने व्यंग्य ( कटाक्ष ) के द्वारा उद्धव से अपने मन की बातें कहीं । इसलिए उद्धव और गोपियों का संवाद ‘ भ्रमरगीत ‘ नाम से प्रसिद्ध है ।

गोपियों ने व्यंग्य करते हुए उद्धव को भाग्यशाली कहा है , क्योंकि वे श्रीकृष्ण के सान्निध्य में रहने के बावजूद उनसे प्रेम नहीं करते और इसका प्रमाण है उद्धव द्वारा दिया गया योग साधना का उपदेश । गोपियाँ योग साधना को स्वयं के लिए व्यर्थ बताती हैं । साथ ही , उन्होंने श्रीकृष्ण को उनका राजधर्म भी याद दिलाया है ।

पदों का भावार्थ

पहला पद

ऊधौं , तुम हाँ अति बड़भागी ।

अपरस रहत सनेह तगा तैं , नाहिन मन अनुरागी ।

पुरइनि पात रहत जल भीतर , ता रस देह न दागी ।

ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि , बूँद न ताकौं लागी ।

प्रीति – नदी मैं पाउँ न बोरयौ , दृष्टि न रूप परागी ।

‘ सूरदास ‘ अबला हम भोरी , गुर चाँटी ज्यौं पागी ||

शब्दार्थ

ऊधौ – उद्भव

हौ – हो

अति- बहुत

बड़भागी – भाग्यवान

अपरस- अछूता

सनेह – स्नेह

तगा- धागा / बंधन

नाहिन – नहीं

अनुरागी – प्रेम से भरा हुआ

पुरइनि पात – कमल का पत्ता

दागी – दाग / धब्बा

ज्यौं- जैसे

माहँ – बीच में

ताकौं- उसको

प्रीति नदी – प्रेम की नदी

पाउँ – पैर

बोरयौ – डुबोया

परागी – मुग्ध होना

अबला – बेचारी नारी

भोरी – भोली

गुर चाँटी ज्यौं पागी- जिस प्रकार चींटी गुड़ में लिपटती है

भावार्थ – गोपियाँ व्यंग्य करते हुए उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव ! तुम बहुत भाग्यवान हो , जो अभी तक श्रीकृष्ण के साथ रहते हुए भी उनके प्रेम के बंधन से अछूते हो और न ही तुम्हारे मन में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेमभाव उत्पन्न हुआ है । गोपियाँ उद्धव की तुलना कमल के पत्तों व तेल के गागर से करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार कमल के पत्ते हमेशा जल में ही रहते हैं , लेकिन उन पर जल के कारण कोई दाग दिखाई नहीं देता अर्थात् वे जल के प्रभाव से निर्लिप्त होती हैं । इसके अतिरिक्त जिस प्रकार तेल से भरी हुई मटकी पानी के मध्य में रहने पर भी उसमें रखा हुआ तेल पानी के प्रभाव से अप्रभावित रहता है , उसी प्रकार श्रीकृष्ण के साथ रहने पर भी तुम्हारे ऊपर उनके प्रेम तत्त्व का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । आगे वे कहती हैं कि तुमने प्रेम रूपी नदी में कभी पाँव नहीं डुबोया है और न ही तुम्हारी दृष्टि कृष्ण के रूप – सौंदर्य पर मुग्ध हुई , लेकिन हे उद्धव ! हम तो भोली – भाली अबलाएँ हैं , हमें तो तुम्हारी तरह कोई ज्ञान नहीं है । जिस प्रकार चींटियाँ गुड़ से चिपक जाती हैं , ठीक उसी प्रकार हम भी श्रीकृष्ण के प्रेम में उलझ ( लिपट ) गई हैं ।

दूसरा पद

मन की मन ही माँझ रही ।

कहिए जाइ कौन पै ऊधौ , नाहीं परत कही ।

अवधि अधार आस आवन की , तन मन बिथा सही ।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि – सुनि , बिरहिनि बिरह दही ।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं , उत तैं धार बही ।

‘ सूरदास ‘ अब धीर धरहिं क्यौं , मरजादा न लही ।

शब्दार्थ

माँझ- अंदर में

अवधि- समय

अधार- आधार

आस – आशा

आवन – आने की

बिथा – व्यथा / दुःखः

जोग सँदेसनि – योग के संदेशों को

बिरहिनि – वियोग में जीने वाली

बिरह दही – विरह की आग में जल रही हैं

हुती – थीं

गुहारि – रक्षा के लिए पुकारना

जितहि तैं – जहाँ से

उत तैं- उधर से

धार – योग की धारा

धीर – धैर्य

धरहिं – धारण करें / रखें

मरजादा – मर्यादा

लही – रही

भावार्थ – गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हमारे मन की अभिलाषाएँ हमारे मन में ही रह गईं , क्योंकि हम श्रीकृष्ण से यह कह नहीं पाईं कि हम उनसे प्रेम करती हैं । हे उद्धव ! अब तुम ही बताओ हम अपनी यह व्यथा किसे जाकर कहें ? अब तक उनके आने की आशा ही हमारे जीने का आधार थी । उसी आशा के आधार पर हमने अपने तन – मन के दुःखों को सहन किया था । अब उनके द्वारा भेजे गए जोग अर्थात् योग के संदेश को सुनकर हम विरह की ज्वाला में जल रही हैं । हम जहाँ से भी श्रीकृष्ण के विरह की ज्वाला से अपनी रक्षा करने के लिए सहारा चाह रही थीं , उधर से ही योग की धारा बहती चली आ रही है । सूरदास गोपियों के माध्यम से कह रहे हैं – अब जब श्रीकृष्ण ने ही सभी मर्यादाओं का त्याग कर दिया , तो भला हम धैर्य धारण कैसे कर सकती हैं ?

तीसरा पद

हमारैं हरि हारिल की लकरी ।

मन क्रम बचन नंद – नंदन उर , यह दृढ़ करि पकरी ।

जागत सोवत स्वप्न दिवस- निसि , कान्ह – कान्ह जकरी ।

सुनत जोग लागत है ऐसौ , ज्यौं करुई ककरी ।

सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए , देखी सुनी न करी ।

यह तौ ‘ सूर ‘ तिनहिं लै सौंपो , जिनके मन चकरी ।।

शब्दार्थ

हरि – श्रीकृष्ण

हारिल – ऐसा पक्षी , जो अपने पैरों में लकड़ी दबाए रहता है

लकरी- लकड़ी

क्रम – कार्य

नंद नंदन – नंद का पुत्र कृष्ण

दृढ़ – मज़बूती से / दृढ़तापूर्वक

उर- हृदय

पकरी- पकड़ी

दिवस – निसि – दिन – रात

जक री- रटती रहती हैं

जोग – योग का संदेश

करुई – कड़वी

ककरी – ककड़ी

सु – वह

ब्याधि – रोग

तिनहिं – उनको

मन चकरी- जिनका मन स्थिर नहीं रहता

भावार्थ – गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हमारे श्रीकृष्ण तो हमारे लिए हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं । जिस प्रकार हारिल पक्षी अपने पैरों में दबाई लकड़ी को नहीं छोड़ता , उसी प्रकार हमने भी मन , वचन और कर्म से श्रीकृष्ण को दृढ़तापूर्वक अपने हृदय में बसाया हुआ है । हम तो जागते सोते , सपने में और दिन – रात कान्हा – कान्हा रटती रहती हैं । हमें तो जोग का नाम सुनते ही ऐसा लगता है , जैसे मुँह में कड़वी ककड़ी चली गई हो । योग रूपी जिस बीमारी को तुम हमारे लिए लाए हो , उसे हमने न तो पहले कभी देखा है , न उसके बारे में सुना है और न ही इसका कभी व्यवहार करके देखा है । सूरदास गोपियों के माध्यम से कहते हैं कि इस जोग को तो तुम उन्हीं को जाकर सौंप दो , जिनका मन चकरी के समान चंचल है । हमारा मन तो स्थिर है , वह तो सदैव श्रीकृष्ण के प्रेम में ही रमा रहता है ।

चौथा पद

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए ।

समुझी बात कहत मधुकर के , समाचार सब पाए ।

इक अति चतुर हुते पहिलै ही , अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए ।

बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी , जोग – सँदेस पठाए ।

ऊधौ भले लोग आगे के , पर हित डोलत धाए ।

अब अपने मन फेर पाइहैं , चलत जु हुते चुराए ।

ते क्यौं अनीति करैं आपुन , जे और अनीति छुड़ाए ।

राज धरम तो यहँ ‘ सूर ‘ , जो प्रजा न जाहिं सताए ।।

शब्दार्थ

पढ़ि आए – पढ़कर / सीखकर आए

मधुकर – भौरा , गोपियों द्वारा उद्धव के लिए प्रयुक्त संबोधन

हुते – थे

पठाए- भेजा

आगे के – पहले के

पर हित- दूसरों की भलाई के लिए

डोलत धाए- घूमते – फिरते थे

फेर – फिर से

पाइहैं – चाहिए

आपुन – अपनों पर

अनीति – अन्याय

भावार्थ – गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हम तुम्हारी बातें सुनकर ही श्रीकृष्ण के मंतव्य को समझ गए थे । गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक उद्धव से कहती हैं कि श्रीकृष्ण पहले से ही बहुत चतुर चालाक थे , अब मथुरा पहुँचकर शायद उन्होंने राजनीति शास्त्र भी पढ़ लिया है , जिससे वे और अधिक बुद्धिमान हो गए हैं , जो उन्होंने तुम्हारे द्वारा जोग ( योग ) का संदेश भेजा है । हे उद्धव ! पहले के लोग बहुत भले थे , जो दूसरों की भलाई करने के लिए दौड़े चले आते थे । अब श्रीकृष्ण बदल गए हैं । गोपियाँ कहती हैं कि वे मथुरा जाते समय हमारा मन अपने साथ ले गए थे , अब हमें वो वापस चाहिए । वे तो दूसरों को अन्याय से बचाते हैं , फिर हमारे लिए योग का संदेश भेजकर हम पर अन्याय क्यों कर रहे हैं ? सूरदास के शब्दों में गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव ! राजधर्म तो यही कहता है कि प्रजा के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए और न ही सताना चाहिए । इसलिए कृष्ण को योग का संदेश वापस लेकर स्वयं दर्शन के लिए आना चाहिए ।

Leave a Comment