NCERT Class 9 Sparsh Chapter 15 Dohe Explanation खुशबू रचते हैं हाथ

NCERT Class 9 Sparsh Chapter 15 Dohe Explanation खुशबू रचते हैं हाथ

NCERT Class 9 Sparsh Chapter 15 Dohe Explanation खुशबू रचते हैं हाथ

NCERT Class 9 Sparsh Chapter 15 Dohe Explanation खुशबू रचते हैं हाथ, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT Poem Explanation for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

NCERT Class 9 Sparsh Chapter 15 Dohe Explanation खुशबू रचते हैं हाथ

भावार्थ

1. नए इलाके में

1. इन नए बसते इलाकों में

जहाँ रोज़ बन रहे हैं नए – नए मकान

मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ

धोखा दे जाते हैं पुराने निशान

खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़

खोजता हूँ ढहा हुआ घर

और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ

मुड़ना था मुझे

फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का

घर था इकमंज़िला

और मैं हर बार एक घर पीछे

चल देता हूँ

या दो घर आगे ठकमकाता ।

शब्दार्थ

इलाका – क्षेत्र

ढहा – गिरा हुआ

ठकमकाता- धीरे धीरे डगमगाते हुए ।

भावार्थ – प्रस्तुत काव्यांश में कवि ने नए इलाकों में हो रहे नए निर्माण के गति के साथ – साथ उससे उत्पन्न पहचान के संकट का यथार्थ चित्रण किया है । कवि किसी नई बस्ती में पहुँचता है तो प्रायः रास्ता भूल जाता है कारण यह है कि वहाँ रोज नए – नए मकान बन रहे हैं । उन नए मकानों की भूल – भुलैया में वह अकसर रास्ता भूल जाता है । इसलिए उसने ठिकानों तक पहुँचने के लिए आने – जाने के रास्तों पर निशान बनाए थे , वो भी काम नहीं आते । पुराने रास्ते भ्रम में डालते हैं । वि कहता है कि गंतव्य तक पहुँचने के लिए रास्ते में हमने जिस पीपल के पेड़ को , ढहे हुए घर को और खाली जमीन के टुकड़े को जहाँ से मुझे बाएँ मुड़कर दो मकान बाद इकमंजिला बिना रंगोंवाले फाटक लगे घर को निशान के रूप में याद किया था , वे सब के सब इस परिवर्तनशील संसार में हमें धोखा दे जाते हैं । यानी कि इनका अब कहीं नामों – निशान नहीं रह गया है । उसे हर बार ऐसा लगता है जैसे वह एक घर पीछे आ गया है या फिर दो घर डगमगाते हुए आगे बढ़ गया है ।

शिल्प- सौंदर्य –

1. कवि के अनुसार पल पल बनती बिगड़ती दुनिया में स्मृतियों के भरोसे नहीं जिया जा सकता ।

2. खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है ।

3. भाषा स्वाभाविक व रोचक है ।

4. चित्रात्मक व वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

5. कहीं – कहीं भावात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

6. आम बोलचाल की भाषा का प्रभाव दिखाई देता है ।

7. ( i ) ‘ नए – नए ‘ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है ।

( ii ) ‘ पुराने- निशान ‘ में अनुप्रास अलंकार है ।

2. यहाँ रोज़ कुछ बन रहा है

रोज़ कुछ घट रहा है

यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं

एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ

जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ

अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ

और पूछो – क्या यही है वो घर ?

समय बहुत कम है तुम्हारे पास

आ चला पानी ढहा आ रहा अकास

शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर ।

शब्दार्थ –

घट – घटित होना

स्मृति – याद

वसंत – एक मनमोहक ऋतु

पतझड़ – एक ऋतु जिसमें पत्ते झड़ जाते हैं

बैसाख- चैत्र के बाद वाला महीना

भादों – सावन के बाद आनेवाला महीना ।

भावार्थ- स्मृति पर भरोसा न करते हुए नित्य घटनेवाली घटनाओं का चित्रण करते हुए कवि कहते हैं कि प्रत्येक दिन मुझे परिवर्तन का आभास दिलाता है , कुछ न कुछ नवीन बनता रहता है । प्रत्येक दिन कुछ नवीन घटता रहता है । मनुष्य को अपनी स्मरण शक्ति पर भरोसा नहीं है । पुरानी यादें एक ही दिन में मिट जाती हैं । स्मृतियाँ पुरानी पड़ जाती हैं । ऐसा प्रतीत होता है जैसे वसंत ऋतु में जाने के पश्चात् पतझड़ में लौटा हूँ अर्थात् दीर्घकाल के बाद ( लगभग एक साल बाद ) लौटकर आया हूँ । ऐसा प्रतीत होने लगता है कि जैसे बैसाख के महीने में जाकर भादों को लौटा हूँ अर्थात् पाँच माह की दीर्घ अवधि के बाद वापिस लौटा हूँ । यही उपाय शेष है कि प्रत्येक दरवाज़े को टखटाकर यह पूछा जाए कि क्या यही वह है जिसे मैं ढूँढ़ रहा हूँ । जीवन में समय बहुत कम है ऐसा लगता हैं कि जैसे आकाश सिर पर गिरा चला रहा हो । ऐसा लगता है कि शायद कोई पहचाना हुआ पुकार ले |

शिल्प – सौंदर्य –

1. जीवन की गति परिवर्तनशील है । जीवन के इस सत्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है ।

2. खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है ।

3. भाषा स्वाभाविक व रोचक है ।

4. चित्रात्मक व वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

5. कहीं – कहीं भावात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

6. आम बोलचाल की भाषा का प्रभाव दिखाई देता है ।

7. ‘ जैसे बसंत …. लौटा हूँ ‘ में उत्प्रेक्षा अलंकार है ।

 

2. खुशबू रचते हैं हाथ

1. कई गलियों के बीच

कई नालों के पार

कूड़े – करकट के

ढेरों के बाद

बदबू से फटते जाते इस

टोले के अंदर

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ ।

शब्दार्थ-

नाला- गंदे पानी के बहाव के लिए बनाया गाया रास्ता

कूड़ा – करकट – कचरा

टोला – छोटी बस्ती

भावार्थ- कवि के अनुसार सुगंधित वस्तुओं का निर्माण करनेवालों का जीवनयापन निम्न स्तर का है । इसी के विषय में बताते हुए कवि कहते हैं कि जो हाथ खुशबू फैलानेवाली अगरबत्तियों का निर्माण करते हैं , वे स्वयं कैसी बदबूदार बस्तियों में रहते हैं । वे लोग कई बस्तियों के बीच रहते हैं । कई नालों को पार करने के बाद कूड़े – करकट और गंदगी के ढेरों के आसपास उन्हें रहना पड़ता है , जहाँ उनकी नाक बदबू के मारे फटने को हो जाती है । इस प्रकार के स्थान पर टोला बनाकर बस्ती बनाकर ये लोग रहते हैं । इनकी यह विशेषता है कि ये स्वयं बदबूदार वातावरण में रहकर भी अपने हाथों से दूसरों के लिए सुगंधित अगरबत्तियाँ बनाते हैं । दूसरों के जीवन को सुविधाओं से भर देते हैं ।

शिल्प- सौंदर्य –

1. मानवीय जीवन की विषमता को दर्शाया गया है तथा मजदूरों की गंदी बस्ती का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत किया गया है ।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है ।

3. भाषा सरल , सरस व रोचक है ।

4. चित्रात्मक व वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।

5. जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण किया गया है ।

6. अतुकांत व छंदहीन भाषा का प्रयोग हुआ है ।

7. ‘ हाथ ‘ की आवृत्ति प्रभावित करती है ।

2. उभरी नसोंवाले हाथ

घिसे नाखूनोंवाले हाथ

पीपल के पत्ते – से – नए – नए हाथ

जूही की डाल से खुशबूदार हाथ

गंदे कटे – पिटे हाथ

ज़ख्म से फटे हुए हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ |

शब्दार्थ-

जूही- एक फूल

जख्म – घाव

भावार्थ – लोगों के जीवन में खुशबू बिखेरनेवाले हाथ भयावह स्थितियों में जीवन बिता रहे हैं । जीवन की इसी दशा का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि जो मज़दूर खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं और सारे संसार को खुशबू से महका देते हैं , उनमें बूढ़े- बुढ़ियाँ भी हैं । जिनके हाथों की नसें उभर चुकी हैं या जिनके हाथों के नाखून काम करते – करते घिस चुके हैं । अगरबत्तियाँ बनाने वालों में वे नन्हे बालक – बालिकाएँ भी हैं जिनके हाथ पीपल के पत्तों के समान कोमल हैं । उनमें नवयुवतियाँ भी हैं । इनके हाथ जूही के फूल की डाली के समान खुशबूदार हैं । इनमें काम की अधिकता के कारण गंदे हाथोंवाले और कटे हाथोंवाले मज़दूर भी हैं और अपने मालिक , पति या पिता की मार खाए हुए हाथ भी हैं । कुछ मजदूर ऐसे हैं , जिनके हाथों में घाव हो चुका है । ‘ फिर भी वे काम किए जा रहे हैं । इतनी विपत्तियों के बावजूद ये काम करते चले जा रहे हैं ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. उपेक्षित वर्ग की दयनीय स्थिति का वर्णन किया गया है ।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है ।

3. भाषा सरल , सरस व रोचक है ।

4. चित्रात्मक व वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।

5. जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण किया गया है ।

6. आम प्रचलित उर्दू शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ है ।

7. हाथ की आवृत्ति प्रभावित करती है ।

8. ‘ पीपल के पत्ते – से नए – नए हाथ ‘ तथा ‘ जूही की डाल से खूशबूदार हाथ ‘ में उपमा अलंकार है ।

3. यहीं इस गली में बनती हैं

मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ

इन्हीं गंदे मुहल्लों के गंदे लोग

बनाते हैं केवड़ा गुलाब खस और रातरानी

अगरबत्तियाँ

दुनिया की सारी गंदगी के बीच

दुनिया की सारी खुशबू

रचते रहते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ

शब्दार्थ –

मुल्क – देश

केवड़ा – एक छोटा पेड़ जिसके फूल खुशबूदार होते हैं

रातरानी – एक फूल

भावार्थ – कवि कहता है कि देश की प्रसिद्ध अगरबत्तियाँ इस गंदी , तंग , बदबूदार गली में बनती हैं । इन्हीं गंदे मुहल्लों में रहने वाले गंदे लोग सुगंधित केवड़ा , गुलाब , पोस्ता और रात – रानी की सुगंध वाली महकती अगरबत्तियाँ बनाते हैं । यद्यपि वे खुद दुनिया भर की गंदगी के बीचोंबीच रहकर जीते हैं तथापि अपने हाथों से दुनिया को महकाने वाली खुशबूदार अगरब . त्तियाँ बनाते हैं । इस प्रकार वे स्वयं गंदे रहकर भी खुशबू बाँटते हैं । यही श्रमिक खुशबू पैदा करते हैं । खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं और सुगंध बिखेरते हैं ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. कवि ने मजदूरों की दयनीय दशा का मार्मिक चित्रण किया है ।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है ।

3. भाषा सरल , सरस व रोचक है ।

4. चित्रात्मक व वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।

5. जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण किया गया है ।

6. आम प्रचलित उर्दू शब्दों का अधिक प्रयोग हुआ है ।

7. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

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