NCERT Class 9 Kshitij Chapter 9 Dohe Explanation साखियाँ एवं सबद

NCERT Class 9 Kshitij Chapter 9 Dohe Explanation साखियाँ एवं सबद

Kshitij Chapter 9 Dohe Explanation साखियाँ एवं सबद

NCERT Class 9 Kshitij Chapter 9 Dohe Explanation साखियाँ एवं सबद, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT Poem Explanation for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

NCERT Class 9 Kshitij Chapter 9 Dohe Explanation साखियाँ एवं सबद

 

कवि परिचय

जीवन परिचय – भक्तिकाल के कवियों में प्रमुख स्थान रखने वाले तथा सामाजिक बुराइयों पर कड़ी चोट करने वाले कबीर का जन्म सन 1398 में हुआ था । ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था , जिसने शिशु कबीर को वाराणसी के निकट लहरतारा नामक स्थान पर तालाब के किनारे छोड़ दिया था । उसी रास्ते से गुज़रने वाले निःसंतान जुलाहा दंपती नीरू और नीमा ने उस बालक को देखा और उठा लिया । उन्होंने कबीर का पालन – पोषण किया । कबीर ने कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की । उन्होंने संतों की संगति में ज्ञान प्राप्त किया । उनके गुरु का नाम रामानंद था । उनकी पत्नी का नाम लोई था । उनकी मृत्यु सन 1518 में हुई ।

रचना परिचय – कबीर अनपढ़ संत थे । वे पदों की रचना करते तथा गाते । इन्हीं पदों को उनके शिष्यों ने संकलित किया । इन्हें साखी , सबद तथा रमैनी नाम से जाना जाता है । इनका संग्रह ‘ बीजक ‘ नाम से प्रसिद्ध है । कुछ लोग ‘ कबीर ग्रंथावली ’ को भी इनकी ही रचना मानते हैं ।

काव्यगत विशेषताएँ – कबीर के काव्य में गुरु – भक्ति , गुरु – महिमा , साधु – महिमा , आत्मबोध तथा ईश्वर के प्रति अथाह प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है । कबीर ने तत्कालीन सामाजिक बुराइयों , मूर्तिपूजा , छुआछूत , ऊँच – नीच की भावना आदि पर प्रहार किया । उन्होंने हिंदू – मुसलमान एकता तथा विभिन्न धर्मों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया । उन्होंने हिंदू – मुसलमान दोनों धर्मों के तथाकथित ठेकेदारों की कड़े शब्दों में निंदा की । उन्होंने दोनों को सच्चे मन से प्रभुभक्ति का संदेश दिया ।

भाषा – शैली – कबीर ने अपने काव्य में ब्रज , अवधी , पंजाबी , राजस्थानी , अरबी – फ़ारसी आदि शब्दों का प्रयोग किया । कुछ विद्वान उनकी भाषा को सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहते हैं । उनकी भाषा में अक्खड़पन है । साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें भाषा का डिक्टेटर कहा है । उन्होंने दोहों तथा पदों की रचना की है , जिसमें रूपक , उपमा , अनुप्रास , यमक , विरोधाभास आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग है ।

भावार्थ

साखियाँ

1. साखियाँ मानसरोवर सुभर जल , हंसा केलि कराहिं ।

मुकताफल मुकता चुगैं , अब उड़ि अनत न जाहिं ।।

शब्दार्थ-

मानसरोवर – तिब्बत में एक बड़ी झील , मनरूपी सरोवर अर्थात हृदय

सुभर – अच्छी तरह भरा हुआ

हंस – हंस पक्षी , जीव का प्रतीक

केलि – क्रीड़ा

कराहिं – करना

मुकताफल – मोती , प्रभु की भक्ति

उड़ि – उड़कर

अनत – अन्यत्र , कहीं और

जाहिं – जाते हैं

भावार्थ – मानसरोवर स्वच्छ जल से पूरी तरह भरा हुआ है । उसमें हंस क्रीड़ा करते हुए मोतियों को चुग रहे हैं । वे इस आनंददायक स्थान को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहते हैं । आशय यह है कि जीवात्मा प्रभुभक्ति में लीन होकर मन में परम आनंद का सुख लूट रहे हैं । वे स्वच्छंद होकर मुक्ति का आनंद उठा रहे हैं । वे इस सुख ( मुक्ति ) को छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाना चाहते हैं ।

2. प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं , प्रेमी मिले न कोइ ।

प्रेमी कौं प्रेमी मिलै , सब विष अमृत होइ | |

शब्दार्थ –

प्रेमी – प्रेम करनेवाला ( प्रभु – भक्त )

फिरौं – घूमता हूँ

होइ – हो जाता है

भावार्थ – कवि कहता है कि मैं ईश्वर प्रेमी अर्थात प्रभु – भक्त को ढूँढ़ता फिर रहा था , पर अहंकार के कारण मुझे कोई प्रभु – भक्त न मिला । जब दो सच्चे प्रभु – भक्त मिलते हैं तो मन की सारी विष रूपी बुराइयाँ समाप्त हो जाती हैं तथा मन में अमृतमयी अच्छाइयाँ आ जाती हैं । अन्य भाव – अहंकार ( मैं ) प्रभु को ढूँढ़ रहा था पर प्रभु की प्राप्ति नहीं हो रही है । ईश्वर की प्राप्ति होते ही अहंकार सद्गुणों में बदल जाता है ।

3. हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ , सहज दुलीचा डारि ।

स्वान रूप संसार है , भूँकन दे झख मारि | |

शब्दार्थ-

हस्ती – हाथी

सहज – प्राकृतिक समाधि

दुलीचा – कालीन

स्वान – कुत्ता

भूँकन दे- भौंकने दो

झख मारना –समय बरबाद करना

भावार्थ – कवि ज्ञान – प्राप्ति में लगे साधकों को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम ज्ञानरूपी हाथी पर सहज समाधि रूपी आसन ( कालीन ) बिछाकर अपने मार्ग पर निश्चिततापूर्वक चलते रहो | यह संसार कुत्ते के समान है जो हाथी को चलते देखकर निरुद्देश्य भौंकता रहता है । अर्थात साधक को ज्ञान प्राप्ति में लीन देखकर दुनियावाले अनेक तरह की उल्टी – सीधी बातें करते हैं , परंतु उसे दुनिया के लोगों की निंदा की परवाह नहीं करनी चाहिए ।

4. पखापखी के कारनै , सब जग रहा भुलान ।

निरपख होइ के हरि भजै , सोई संत सुजान ।।

शब्दार्थ –

पखापखी – पक्ष और विपक्ष

कारनै – कारण

भुलान- भूला हुआ

निरपख – निष्पक्ष

भजै – भजन करना , स्मरण करना

सोई – वही

सुजान – चतुर , ज्ञानी , सज्जन

भावार्थ – लोग अपने धर्म , संप्रदाय ( पक्ष ) को दूसरों से बेहतर मानते हैं । वे अपने पक्ष का समर्थन तथा दूसरे की निंदा करते हैं । इसी पक्ष – विपक्ष के चक्कर में पड़कर वे अपना वास्तविक उद्देश्य भूल जाते हैं । जो धर्म – संप्रदाय के चक्कर में पड़े बिना ईश्वर की भक्ति करते हैं वही सच्चे ज्ञानी हैं ।

5. हिंदू मूआ राम कहि , मुसलमान खुदाइ ।

कहै कबीर सो जीवता , जो दुहुँ के निकट न जाइ ।।

शब्दार्थ –

मूआ – मर गया

सो जीवता – वही जीता है

दुहुँ – दोनों

निकटि – पास , नज़दीक

जाइ – जाता है

भावार्थ – निराकार ब्रह्म की उपासना की सीख देते हुए कवि कहता है कि हिंदू राम का जाप करते हुए तथा मुसलमान खुदा की बंदगी करते हुए मर मिटे तथा आनेवाली पीढ़ी के लिए कट्टरता छोड़ गए । वास्तव में राम और खुदा तो एक ही हैं । कवि के अनुसार जो राम और खुदा के चक्कर में न पड़कर प्रभु की भक्ति करता है , वही सच्चे रूप में जीवित है और सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है ।

6. काबा फिरि कासी भया , रामहिं भया रहीम ।

मोट चून मैदा भया , बैठि कबीरा जीम | |

शब्दार्थ –

काबा – मुसलमानों का पवित्र तीर्थस्थान

कासी – हिंदुओं का पवित्र तीर्थस्थल

भया – हो गया

मोट चून – मोटा आटा

बैठि – बैठकर

जीम – भोजन करना

भावार्थ – कवि कहता है कि मैं जब राम – रहीम , हिंदू – मुसलमान के भेद से ऊपर उठ गया तो मेरे लिए काशी तथा काबा में कोई अंतर नहीं रह गया । मन की जिस कलुषिता के कारण जिस मोटे आटे को अखाद्य समझ रहा था , अब वही बारीक मैदा हो गया , जिसे मैं आराम से खा रहा हूँ । अर्थात मन से सांप्रदायिकता तथा भेदभाव की दुर्भावना समाप्त हो गई है ।

7. ऊँचे कुल का जनमिया , जे करनी ऊँच न होइ ।

सुबरन कलस सुरा भरा , साधू निंदा सोइ | |

शब्दार्थ –

ऊँचा कुल – अच्छा खानदान

जनमिया – पैदा होकर

करनी – कर्म

सुबरन – सोने का

कलस – घड़ा

सुरा- शराब

निंदा – बुराई

सोइ – उसकी

भावार्थ – कर्मों के महत्व को बताते हुए कवि कहता है कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं बन जाता है । इसके लिए अच्छे कर्म करने पड़ते हैं । इसी का उदाहरण देते हुए कबीर कहते हैं कि सोने के पात्र में शराब भरी हो तो भी सज्जन उसकी निंदा ही करते हैं ।

सबद ( पद )

( 1 )

मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे , मैं तो तेरे पास में ।

ना मैं देवल ना मैं मसजिद , ना काबे कैलास में ।

ना तो कौने क्रिया – कर्म में , नहीं योग बैराग में ।

खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं , पल भर की तालास में ।

कहैं कबीर सुनो भई साधो , सब स्वाँसों की स्वाँस में ।।

शब्दार्थ –

मोकों – मुझको

बंदे – मनुष्य

देवल – देवालय , मंदिर

काबा – मुसलमानों का तीर्थस्थल

कैलास – कैलाश पर्वत जहाँ भगवान शिव का वास माना जाता है

कौने- किसी

क्रिया – कर्म- मनुष्य द्वारा ईश्वर की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले आडंबर

योग – योग साधना

बैराग – वैराग्य

तुरतै – तुरंत

मिलिहौं – मिलेंगे

तालास – खोज

भावार्थ- मनुष्य जीवन – भर ईश्वर को पाने का उपाय करता है तथा नाना प्रकार की क्रियाएँ करता है , पर उसे प्रभु के दर्शन नहीं होते हैं । इसी संबंध में स्वयं निराकार बम मनुष्य से कहते हैं कि हे मनुष्य ! तूने मुझे कहाँ खोजा , मैं तो तेरे पास में ही हूँ । मैं किसी मंदिर – मस्जिद या देवालय में नहीं रहता हूँ न किसी तीर्थस्थान पर । मैं किसी आडंबरयुक्त क्रियाओं से भी नहीं मिल सकता । जो मुझे सच्चे मन से खोजता है , उसे मैं पल भर में ही मिल सकता हूँ क्योंकि मैं तो हर प्राणी की प्रत्येक साँस में मौजूद हूँ । मुझे खोजना है तो अपने मन में खोज ले ।

( 2 )

संतौं भाई आई ग्याँन की आँधी रे ।

भ्रम की टाटी सबै उड़ाँनी , माया रहै न बाँधी ।।

हिति चित्त की वै यूँनी गिराँनी , मोह बलिंडा तूटा ।

त्रिस्नोँ छाँनि परि घर ऊपरि , कुबधि का भाँडाँ फूटा ।।

जोग जुगति करि संतौं बाँधी , निरचू चुवै न पाँणी ।

कूड़ कपट काया का निकस्या , हरि की गति जब जाँणी ।।

आँधी पीछै जो जल बूठा , प्रेम हरि जन भींनाँ ।

कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनोँ ।।

शब्दार्थ –

भ्रम – संदेह

टाटी – घास , फूस तथा बाँस की फट्टियों से बनाया गया आवरण

उड़ाँनी – उड़ गई

माया – मोह ( रस्सी )

बाँधी – बँधकर

हिति – स्वार्थ

चित्त – मन

दुवै – दो

यूँनी – सहारे के लिए लगाई गई लकड़ी , टेक

गिराँनी – गिर गई

बलिंडा – मोटी बल्ली जो छप्पर के बीचोंबीच बाँधी जाती है

तूटा – टूट गया

त्रिस्नाँ – तृष्णा , लालच

छाँनि – छप्पर

कुबधि – दुर्बुद्धि

भाँडाँ – बर्तन

जोग जुगति – योग साधना के उपाय

निरचू – तनिक भी

चुवै – टपकना

निकस्या – निकल गया

जाँणी – समझ में आई

बूठा – बरसा

भींनोँ – भीग गया

भाँन ( भानु ) – सूरज

उदित भया – निकल आया

तम- अंधकार

खीनोँ – क्षीण या नष्ट होना

भावार्थ – ज्ञान का महत्व प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि हे संतो ! ज्ञान की आँधी आई । उसके प्रभावों से भ्रम का आवरण उड़ गया । वह माया की रस्सी से बँधा न रह सका । स्वार्थ के खंभे तथा मोह की बल्लियाँ टूट गईं । तृष्णा का छप्पर गिरने से कुबुद्धि के सभी बर्तन टूट गए । संतों ने योग – साधना के उपायों से नया मज़बूत छप्पर बनाया , जिससे तनिक भी पानी नहीं टपकता । संतों ने जब प्रभु का मर्म जान लिया तो उनका शरीर निष्कपट हो गया । इस ज्ञान रूपी आँधी के फलस्वरूप प्रभु – भक्ति की जो वर्षा हुई , उससे हरि के प्रेम में सभी भीग गए । इस प्रकार ज्ञान के सूर्योदय से संतों के मन का अंधकार नष्ट हो गया ।

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