NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 6 Summary प्रेमचंद के फटे जूते

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 6 Summary प्रेमचंद के फटे जूते

Hindi Kshitij Chapter 6 Summary प्रेमचंद के फटे जूते

NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 6 Summary प्रेमचंद के फटे जूते, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schoo ls. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

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NCERT Class 9 Hindi Kshitij Chapter 6 Summary प्रेमचंद के फटे जूते

 

लेखक परिचय

जीवन परिचय – प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त , सन 1922 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जनपद के जमानी गाँव में हुआ था । उनकी आरंभिक शिक्षा गाँव में हुई । उन्होंने नागपुर से हिंदी में एम.ए. किया और अध्यापन कार्य करने लगे । वे सन 1947 से लेखन कार्य में जुट गए । उन्होंने जबलपुर से ‘ वसुधा ‘ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जिसकी काफी सराहना हुई । उनका निधन सन 1995 में हो गया ।

रचना परिचय – हिंदी के व्यंग्य लेखकों में प्रमुख श्री परसाई जी ने दो दर्जन पुस्तकें लिखीं जिनमें से प्रमुख हैं –

कहानी संग्रह – हँसते हैं रोते हैं , जैसे उनके दिन फिरे ।

उपन्यास – रानी नागफनी की कहानी , तट की खोज ।

निबंध संग्रह – तब की बात और थी , भूत के पाँव पीछे , बेईमानी की परत , पगडंडियों का ज़माना , सदाचार का ताबीज , शिकायत मुझे भी है , और अंत में ।

व्यंग्य संग्रह – वैष्णव की फिसलन , तिरछी रेखाएँ , ठिठुरता हुआ गणतंत्र , विकलांग श्रद्धा का दौर आदि ।

साहित्यिक विशेषताएँ – परसाई जी मूलतः व्यंग्य लेखक हैं । वे अपने व्यंग्य से पाठकों को एक ओर गुदगुदाते हैं तो दूसरी ओर भारतीय जीवन के पाखंड , भ्रष्टाचार , अंतर्विरोध , बेईमानी पर लिखे व्यंग्यों द्वारा समाज में व्याप्त कुरीतियों पर करारी चोट करते हैं । अपने लेखन में उन्होंने सामाजिक , राजनैतिक और धार्मिक पाखंड को विषय बनाया । उन्होंने लेखक के माध्यम से भ्रष्ट नेताओं , समाज के शोषकों पर व्यंग्य करते हुए उनके कारनामों को आम जनता के सामने लाने का प्रयास किया है ।

भाषा – शैली – हरिशंकर परसाई ने सरस एवं सरल भाषा में व्यंग्यात्मक शैली में लेखन कार्य किया है । भाषा में हिंदी , उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग किया है । शब्दों का प्रयोग इतनी कुशलता के साथ किया है कि भाषा पाठक के मन को छू जाती है । इनकी हास्य एवं व्यंग्यात्मक शैली पाठक को बाँधे रखती है ।

 

पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ में सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद जी की वेश – भूषा तथा उनके जूतों के माध्यम से एक ओर जहाँ प्रेमचंद के सादगीपूर्ण उच्च विचार को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है वहीं समाज की स्वार्थपरता , अवसरवादिता , दिखावटीपन , दोगले चरित्र , धोखेबाजी की प्रवृत्ति पर करारी चोट की गई है । फोटो में प्रेमचंद के जूतों को देखकर ऐसा लगता है कि सामाजिक बुराइयों से लड़ते – लड़ते ही उनके जूते की यह हालत हुई है ।

लेखक के सामने प्रेमचंद का एक फोटो है जिसमें वे अपनी पत्नी के साथ हैं । फोटो में वे कुरता – धोती पहने हुए तथा सिर पर टोपी लगाए हुए हैं । कनपटी चिपकी , गालों की हड्डियाँ उभरी तथा चेहरे पर घनी मूँछें हैं । पाँवों में केनवस के बेतरतीब बंद वाले जूते उसके बंद के लोहे की पतरी गायब हो गई है । उन्हें किसी तरह बाँध लिया गया है । बाएँ पैर का जूता फटा है , जिसमें से पैर की उँगली दिख रही है । लेखक सोचता है कि यदि यह उनकी फोटो की पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी ।

लेखक सोचता है कि साहित्य के इस पुरखे को अपने जूते फटे होने का ज़रा भी अहसास नहीं है । कोई भी लज्जा या झेंप नहीं है क्योंकि चेहरे पर बड़ी बेपरवाही भरा विश्वास । उनकी अधूरी मुस्कान देखकर लेखक सोचता है कि यह मुस्कान नहीं है इसमें उपहास एवं व्यंग्य छिपा है । ऐसा लगता है कि वे फोटो खिंचाने को बहुत इच्छुक नहीं रहे होंगे । पत्नी के आग्रह को टाल न सके होंगे और अच्छा कहकर फोटो खिंचाने बैठ गए होंगे । इससे अच्छा तो वे मना ही कर देते । लेखक फोटो को देखते – देखते उनके क्लेश को भीतर तक महसूस करके रोने की स्थिति में आ जाता है । वह सोचता है कि लोग फोटो खिंचाने के लिए जूते , कोट और यहाँ तक दूसरों की बीबी तक उधार माँग लेते हैं । लोग इत्र लगाकर फोटो खिंचवाते हैं ताकि फोटो में खुशबू आ जाए । गंदे-से-गंदे आदमी की भी फोटो अच्छी होती है और प्रेमचंद तसवीर को महत्व ही नहीं देते हैं । लेखक मानता है कि आज टोपी जूते से सस्ती है और जब उन्होंने यह फोटो खिंचाया तब भी सस्ती ही रही होगी । महान कथाकार , उपन्यास सम्राट , युग प्रवर्तक आदि नामों से प्रसिद्ध होने वाले ने फोटो में भी ऐसे जूते पहने हुए हैं ।

लेखक प्रेमचंद के जूते से अपने जूते की तुलना करते हुए कहता है कि उसका भी जूता कोई अच्छा नहीं है । ऊपर से अच्छा दिखने वाले जूते का तला घिसा हुआ है । इससे अँगूठा घिसकर लहूलुहान हो गया है । तला घिसते घिसते पूरा पंजा घायल हो जाएगा पर अँगुली नहीं दिखेगी । लेखक फोटो की ओर इशारा करता हुआ कहता है तुम्हारे पाँव सुरक्षित हैं पर अँगुली दिख रही है , मेरी अँगुली ढकी है , पर पंजा घिस रहा है । मैं तुम्हारी तरह फटा जूता नहीं पहन सकता हूँ । लेखक प्रेमचंद की मुस्कान के बारे में अनुमान लगाता है और पूछता है कि क्या होरी का गोदान हो गया ? क्या पूस की रात में नीलगाय हल्कू का खेत चर गई या सुजान भगत का लड़का मर गया , क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकता अथवा माधो औरत के कफन के चंदे की शराब पी गया , यह वही मुस्कान मालूम होती है ।

लेखक सोचता है कि प्रेमचंद का यह जूता आखिर फटा कैसे ? क्या बनिए के तगादे से बचने के लिए दूर तक चक्कर लगाते हुए लौटते थे ? या फिर किसी कठोर चीज पर ठोकर मारते – मारते जूता फट गया । तुम रास्ते के टीले या उस कठोर चीज़ से बचकर भी तो निकल सकते थे । शायद समझौता न कर पाना तुम्हारी कमजोरी थी । वही नेमधरम की कमजोरी जो होरी को ले डूबी थी ।

लेखक अनुमान लगाता है कि यह तुम्हारी उँगली इशारा कर रही है । तुम जिसे घृणित समझते हो उसकी तरफ़ हाथ से नहीं पैर से इशारा करते हो । मैं तुम्हारी उँगली और मुस्कान का इशारा समझता हूँ । तुम अँगुली छिपाकर तलुआ घिसाए चलने वालों पर हँस रहे हो । क्योंकि तुम्हारी उँगली भले ही बाहर निकली हो पर पाँव तो बच रहा है । जिनका तलुआ घिस रहा है , वे चलेंगे कैसे ? मैं तुम्हारी इस व्यंग्य मुस्कान को समझ गया हूँ ।

पाठ के शब्दार्थ

कनपटी – कान के निकट का भाग

केनवस – मोटा कपड़ा जिससे जूते , तिरपाल , थैला ( बैग ) बनाए जाते हैं

बेतरतीब – बिना किसी ढंग के

पुरखे – पूर्वज

उपहास – मज़ाक उड़ाना

आग्रह – हठ , बार – बार कहना

ट्रेजडी – जिसका अंत दुखद हो

क्लेश – दुख

वर – दूल्हा

इत्र – खुशबूदार द्रव्य

तीव्रता – तेजी

युग प्रवर्तक – युग की स्थापना करने वाले

लहूलुहान – घायल

ठाठ – शान

तगादा – उधार के पैसे माँगना

आवत-जात – आते – जाते

पन्हैया – जूते

बिसर गयो – भूल गया

हरिनाम – प्रभु का नाम

उपजत – पैदा होता है

तिनको – उनको

करबों- करूँगा

परै – दूर

सलाम – नमस्कार करना

सदियाँ – सैकड़ों साल

नेम-धरम – धर्म के नियम या नियम और अर्थ

घृणित – घिनौना

बरकरार – बचाकर

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