Class 9 Hindi Sparsh Chapter 10 Summary दोहे

Class 9 Hindi Sparsh Chapter 10 Summary दोहे

Hindi Sparsh Chapter 10 Summary दोहे

Class 9 Hindi Sparsh Chapter 10 Summary दोहे, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT Summary for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

Class 9 Hindi Sparsh Chapter 10 Summary दोहे

 

पाठ का सार

रहीम के नीति के दोहे अत्यधिक प्रसिद्ध हैं । उन्होंने अनुभव के आधार पर दोहे की रचना की है । इसमें उन्होंने मानव जीवन के लिए उपयोगी सभी बातों का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है ।

  • उन्होंने अपने पहले दोहे के माध्यम से प्रेम संबंधों को कभी न तोड़ने की प्रेरणा दी है ।
  • दूसरे दोहे में उन्होंने अपने मन की पीड़ा को मन में ही छिपाकर रखने की प्रेरणा दी है ।
  • तीसरे दोहे में बताया गया है कि एक परमात्मा का ध्यान करने से अन्य सब कार्य भी पूर्ण रूप से संपन्न हो जाते हैं ।
  • चौथे दोहे में – चित्रकूट को शांतिदायक और दुख निवारक स्थान कहा गया है ।
  • पाँचवें दोहे के अनुसार थोड़े – से अक्षरों में गहरा अर्थ छिपा होता है ।
  • छठे दोहे में – जिसकी जहाँ प्यास बुझती है , वही उसके लिए सागर के समान होता है ।
  • सातवें दोहे में – जो लोग प्रसन्न होने पर भी दान नहीं करते , वे पशु से भी हीन हैं ।
  • आठवें दोहे में – बिगड़ी हुई बात लाख सँवारने पर भी नहीं सँवरती ।
  • नवें दोहे में – बड़ों के प्रभाव के सामने छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ।
  • दसवें दोहे में – विपत्ति के समय अपनी पूँजी ही सहायक होती है ।
  • ग्यारहवें दोहे में – पानी , चमक और सम्मान- इन तीनों का जीवन में महत्त्व सर्वोपरि है ।

भावार्थ

1. रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय ।

टूटे से फिर ना मिले , मिले गाँठ परि जाय

शब्दार्थ-

चटकाय- चटक कर , झटके के साथ

परि जाय – पड़ जाती है

भावार्थ- प्रेम का धागा संबंधों को जोड़ता है । इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए रहीम जी कहते हैं कि प्रेम रूपी धागे को झटके से नहीं तोड़ना चाहिए । यह अगर एक बार टूट जाता है तो फिर नहीं जुड़ता और अगर जुड़ता भी है तो इसमें गाँठ पड़ जाती है अर्थात् प्रेम संबंध पूर्ववत् नहीं बन पाते हैं । अतः जब एक बार बन जाते हैं तो उन्हें यत्नपूर्वक बनाए रखना चाहिए । प्रेम संबंधों के टूट जाने पर उनमें पहले जैसा स्नेह नहीं रहता । उसमें खिंचाव बना रहता है ।

कला पक्ष ( शिल्प- सौंदर्य ) –

1. प्रेम की निरंतरता और अखंडता के महत्त्व को बहुत सुंदर युक्ति के माध्यम से समझाया गया है ।

2. दोहे में नीतिपरक सीख दी गई है ।

3. दोहे में भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गेयता है ।

7. ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) श्लेष व रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ हैं ।

गाँठ परि जाय – श्लेष अलंकार

धागा प्रेम का – रूपक अलंकार

 

2. रहिमन निज मन की बिथा , मन ही राखो गोय ।

सुनि अठिहैं लोग सब , बाँटि न हैं कोय ।

शब्दार्थ

निज- अपना

बिथा- दुख

गोय – छिपाकर

अठिलैहैं- मजाक उड़ाना

कोय- कोई भी

भावार्थ – रहीम जी लोगों को अपने मन की पीड़ा दूसरों को न बताने का उपदेश देते हुए कहते हैं कि अपने मन के दुख को मन में ही रखना चाहिए । किसी के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए क्योंकि लोग सुनकर मज़ाक उड़ाते हैं । दूसरों के दुखों को कोई बाँटना नहीं चाहता । अर्थात् दूसरों के दुख सुनना लोगों की आदत नहीं है । वे उसका मज़ाक ही उड़ाते हैं । उसके दुख को दूर करने का प्रयास नहीं करते ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. मन की पीड़ा को किसी को न बताने का निर्देश दिया गया है ।

2. दोहे में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण है ।

3. दोहे में भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7. उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

 

3. एकै साधे सब सधै , सब साधे सब जाय ।

रहिमन मूलहिं सीचिबो , फूलै फलै अघाय ।।

शब्दार्थ-

साधे – साधने पर

सधै – सध जाते हैं

जाय- चले जाते हैं

मूलहिं – जड़ को

फूलै – फूलों से लद जाना

अघाय – तृप्त

भावार्थ – एक कार्य को सिद्ध करने पर सभी कार्य सफल हो जाते हैं । अर्थात् एक परमात्मा को पा लेने से अन्य सब सांसारिक उपलब्धियाँ स्वयमेव प्राप्त हो जाती हैं । यदि परमात्मा की भक्ति न की और अन्य सांसारिक वस्तुओं को पा लिया तो वे सब उपलब्धियाँ परमात्मा के अभाव में कुछ काम नहीं आतीं । रहीम जी कहते हैं यदि वृक्ष को मूल अर्थात जड़ से सींचा जाए तो वृक्ष पर फल – फूल भरपूर मात्रा में आते हैं । इससे फलों को खानेवाले और फूलों का रस लेनेवाले भँवरे आदि तृप्त हो जाते हैं ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. एक मात्र प्रभु की कृपा होने पर सबकी कृपा प्राप्त हो जाती है ।

2. दोहे में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक , उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7 . ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) ‘ एकै साधे सब सधै , सब साधे ‘ में अनुप्रास अलंकार है ।

 

4. चित्रकूट में रमि रहे , रहिमन अवध- नरेस ।

जा पर बिपदा पड़त है , सो आवत यह देस ।।

शब्दार्थ –

रमि रहे – रम गए

अवध – नरेस- अयोध्या के राजा राम

जा पर – जिस पर

विपदा – संकट

भावार्थ – रहीम जी कहते हैं कि यह चित्रकूट अत्यंत मनोरम व धार्मिक स्थान है । जिस पर मुसीबत आती है वही शांति पाने के लिए इस प्रदेश की ओर खिंचा चला आता है । अयोध्या के राजा राम पर मुसीबत पड़ी , उन्हें राजपाट छोड़कर वनों में जाना पड़ा तो वे चित्रकूट चले आए । उनका मन वहाँ रम गया है ।

शिल्प- सौंदर्य –

1. विपत्ति में वन भी राजभवन दिखाई देता है । विपत्ति में राजा राम भी चित्रकूट में जा कर रहे ।

2 . दोहों में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7 . ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) ‘ रमि रहे , रहिमन ‘ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

 

5. दीरघ दोहा अरथ के , आखर थोरे आहिं ।

ज्यों रहीम नट कुंडली , सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ।।

शब्दार्थ-

दीरघ- लंबा

आखर- अक्षर

थोरे – थोड़े

नट – कलाकार

कुंडली – घेरा

सिमिटि – सिकुड़कर

चढ़ि – निकल

भावार्थ – रहीम जी कहते हैं- दोहा छंद ऐसा है जिसमें अक्षर तो थोड़े होते हैं किंतु उनमें बहुत गहरा और दीर्घ अर्थ छिपा रहता है । जिस प्रकार कोई कुशल बाजीगर अपने शरीर को सिकोड़कर तंग मुँहवाली कुंडली के बीच में से कुशलतापूर्वक निकल जाता है उसी प्रकार कुशल दोहाकार दोहे के सीमित से शब्दों में बहुत बड़ी और गहरी बात कह जाता है ।

शिल्प- सौंदर्य –

1. दोहे के थोड़े शब्दों का भी हृदय पर गहरा प्रभाव पड़ता है ।

2. दोहे में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7 . ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) ‘ दीरघ दोहा ‘ में अनुप्रास अलंकार है ।

( iii ) ‘ ज्यों रहीम नट कुंडली , सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ‘ में उत्प्रेक्षा अलंकार है ।

 

6. धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय ।

उदधि बड़ाई कौन है , जगत पिआसो जाय ।

शब्दार्थ-

धनि – धन्य

पंक – कीचड़

लघु जिय – छोटे जीव

पिअत- पीकर

अघाय- तृप्त

उदधि- समुद्र

जगत – संसार

पिआसो – प्यासा

भावार्थ – रहीम जी कहते हैं कि सरोवर या कीचड़ वाला वह जल धन्य है जिसको पीकर लघु जीव भी अपनी प्यास बुझाते हैं । सागर की कोई प्रशंसा नहीं करता क्योंकि संसार वहाँ जाकर भी प्यासा लौट आता है । बड़प्पन उसी का माना जाता है जिससे दूसरे का लाभ हो । मनुष्य के जीवन की सार्थकता दूसरों की भलाई के कारण ही है । यदि अधिक धनवान होने पर भी वह किसी का भला नहीं कर सकते तो उसका धनवान होना व्यर्थ है ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. स्वयं को महान , उच्च और बड़ा दिखाने की बजाय हमें लोगों के काम आना चाहिए ।

2. दोहे में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7. उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

 

7. नाद रीझि तन देत मृग , नर धन हेत समेत ।

ते रहीम पशु से अधिक , रीझेहु कछू न देत ।।

शब्दार्थ –

नाद – ध्वनि

रीझि – मोहित होकर

तन- शरीर

हेत – कल्याण समेत सहित

भावार्थ – संगीत की मधुर ध्वनि से प्रभावित होकर हिरण अपने प्राण तक न्योछावर कर देता है । इसी प्रकार किसी की कला पर मोहित होकर मनुष्य उस पर प्रेम सहित धन अर्पित कर देता है , परंतु वे मनुष्य तो पशु से भी अधिक जड़ हैं जो किसी पर रीझकर भी उसे कुछ नहीं देते ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. दूसरों की अच्छाई से प्रभावित होकर उसे खाली हाथ लौटाना पशुता पूर्ण कर्म है ।

2. दोहों में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक , उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7. ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

 

8. बिगरी बात बनै नहीं , लाख करौ किन कोय ।

रहिमन फाटे दूध को , मथे न माखन होय ॥

शब्दार्थ-

बिगरी बात – बिगड़ी हुई बात

करौ किन – कोय- कोई कुछ भी क्यों न करें

फाटे – फटा हुआ

मथे – मथना , बिलोना

भावार्थ- कोई कितने भी प्रयत्न कर ले , परंतु बिगड़ी बात कभी नहीं बनती । रहीम जी कहते हैं कि फटे हुए दूध को कितना भी मथा जाए , परंतु उसमें से मक्खन नहीं निकाला जा सकता । इसलिए यह प्रयास करना चाहिए कि बात बिगड़ने न पाए । उसे तुरंत सँवारने का प्रयास करना चाहिए , वरना दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. आपसी संबंधों में यदि एक बार बिखराव हो जाता है तो पुनः पूर्ववत स्थापित नहीं हो पाता है । चाहे कितने भी प्रयत्न किए जाएँ , संबंध टूट कर ही रहते हैं ।

2. दोहे में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7 . ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) ‘ बिगरी बात बनै ‘ व ‘ करौ किन कोय ‘ में अनुप्रास अलंकार है ।

 

9. रहिमन देखि बड़ेन को , लघु न दीजिये डारि ।

जहाँ काम आवे सुई , कहा करे तरवारि ।।

शब्दार्थ-

बड़ेन – बड़ों

लघु – छोटा

डारि – डाल

तरवारि – तलवार

भावार्थ – रहीम जी कहते हैं कि बड़े लोगों को देखकर अर्थात् उनके साथ संबंध स्थापित हो जाने पर छोटे लोगों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती । अर्थात् प्रत्येक मनुष्य का अपना महत्त्व होता है । समय आने पर सभी उपयोगी सिद्ध होते हैं । कवि ने तलवार और सुई के उदाहरण द्वारा इसे तथ्य को सिद्ध किया है ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. कवि के अनुसार छोटे लोग जो काम कर सकते हैं वह बड़े नहीं कर सकते । इसलिए कभी छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ।

2. दोहे में नीति परक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ?

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7. ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) ‘ कहा करे तरवारि ‘ में अनुप्रास अलंकार है ।

 

10. रहिमन निज संपति बिना , कोउ न बिपति सहाय ।

बिनु पानी ज्यों जलज को , नहिं रवि सके बचाय ।।

शब्दार्थ –

निज- अपना

बिपति- संकट

सहाय – सहायक

जलज – कमल

रवि – सूर्य

भावार्थ – रहीम जी कहते हैं कि अपनी संपत्ति के अलावा मुसीबत में कोई सहायक सिद्ध नहीं होता । अर्थात् संकट के समय अपना ही धन काम आता है , जैसे पानी के बिना कमल को सूर्य भी नहीं बचा सकता । यद्यपि सूर्य कमल का पोषण करता है तथापि पानी नहीं होता तो कमल सूख जाता है । उसी प्रकार मनुष्य को बाहरी सहायता कितनी ही क्यों न मिले , किंतु उसकी वास्तविक रक्षक निजी संपत्ति ही होती है ।

शिल्प – सौंदर्य –

1. इसमें निज संपत्ति की महिमा बताई गई है ।

2. दोहों में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ?

3. दोहों में भावात्मक उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7 . ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग किया गया है ।

( ii ) अनुप्रास अलंकार का भी प्रयोग हुआ है ।

( iii ) ‘ बिनु पानी ज्यों जलज को , नहि रखि सके बचाय ‘ इस पंक्ति में उत्प्रेक्षा अलंकार है ।

 

11. रहिमन पानी राखिए , बिनु पानी सब सून

पानी गए न ऊबरै , मोती , मानुष , चून ।।

शब्दार्थ-

पानी – चमक , सम्मान , जल

सून – व्यर्थ

ऊबरै – चमके

मानुष – मनुष्य

चून – आटा

भावार्थ – रहीम जी कहते हैं कि पानी का बहुत महत्त्व है । इसे बनाए रखना चाहिए । यदि पानी समाप्त हो जाए तो मोती , मनुष्य और आटे का कोई महत्त्व नहीं रह जाता । पानी अर्थात् चमक के बिना मोती बेकार है पानी अर्थात् सम्मान के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है और जल के बिना रोटी नहीं बन सकती , इसलिए आटा बेकार है ।

शिल्प – सौंदर्य

1. समाज में मनुष्य का सम्मान है तो सब कुछ संभव है अन्यथा जीवन दूभर हो जाता है ।

2. दोहे में नीतिपरक तथ्यों का स्पष्टीकरण किया गया है ।

3. दोहे में भावात्मक , उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

4. दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ।

5. सरल , सरस व प्रभावशाली ब्रज भाषा का प्रयोग दोहे में द्रष्टव्य है ।

6. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है ।

7 . ( i ) उदाहरण अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

( ii ) “ पानी गए न ऊबरै , मोती , मानुष , चून ” इस पंक्ति में श्लेष अलंकार है । पानी के तीन अर्थ हैं- जल , चमक , इज्ज़त ।

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