Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 2 Summary स्मृति - Cbsestudyguru

Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 2 Summary स्मृति

Hindi Sanchayan Chapter 2 Summary स्मृति

Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 2 Summary स्मृति, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

Sometimes, students get stuck inside the exercises and are not able to clear up all of the questions.  To assist students, solve all of the questions, and maintain their studies without a doubt, we have provided a step-by-step NCERT Summary for the students for all classes.  These answers will similarly help students in scoring better marks with the assist of properly illustrated Notes as a way to similarly assist the students and answer the questions right.

Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 2 Summary स्मृति

 

पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ में लेखक श्रीराम शर्मा ने बाल्यावस्था की एक घटना का सजीव चित्रण किया है । इस कहानी का घटनाक्रम इतनी रोमांचक शैली में लिखा गया है कि प्रत्येक क्षण , परिस्थिति की गंभीरता और सामने आए खतरे का वर्णन पाठक के कौतूहल को आदि से अंत तक बनाए रखता है । बच्चों की सहज जिज्ञासा एवं क्रीड़ा कैसे कभी – कभी उन्हें कठिन जोखिमपूर्ण निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा करती है , इसका बहुत ही सजीव वर्णन प्रस्तुत किया गया है ।

सन् 1908 की बात है । दिसंबर का अंत व जनवरी का प्रारंभ था । कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । बूँदाबाँदी के कारण सर्दी बढ़ गई थी । लेखक उस समय झरबेरी से बेर तोड़कर खा रहा था कि भाई का बुलावा आ गया । वह डरते डरते घर में घुसा । भाई साहब ने मक्खनपुर के डाकखाने में पत्र डाल आने का आदेश दिया । माँ ने कुछ चने भुनवाने को दे दिए । दोनों भाई अपना – अपना डंडा लेकर घर से चल पड़े । चिट्ठियों को टोपी में रख लिया । वह अपने डंडे से कई साँपों को मार चुका था , इसलिए उसे डंडे का बहुत सहारा था । दोनों उछलते – कूदते चार फर्लांग की दूरी पार करते हुए कुएँ तक पहुँच गए जिसमें एक काला साँप रहता था । लेखक अपने स्कूल के साथियों के साथ कुएँ में पड़े हुए साँप पर ढेला ज़रूर मारा करता था । ढेला लगते ही साँप फुकार उठता था । इस खेल में उसे तथा उसके साथियों को बहुत आनंद आता था ।

जैसे ही कुआँ सामने आया लेखक के मन में साँप की फुफकार का मजा लेने की बात आ गई । उसने ढेला उठाया और टोपी को उतारते हुए कुएँ में ढेला फेंक दिया । टोपी के नीचे रखी हुई तीनों चिट्ठियाँ कुएँ में जा गिरीं । चिट्ठियाँ बहुत ज़रूरी थीं । लेखक को भाई की पिटाई का डर था । दोनों भाई रोने लगे । तब उन्हें माँ की गोद याद आ रही थी । दिन छिपने को था और घर में पिटाई का डर था । लेखक ने कुएँ में घुसकर चिट्ठियाँ लाने की सोची । छोटा भाई रो रहा था । उनके पास कुल मिलाकर पाँच धोतियाँ थीं । उन सभी धोतियों को आपस में बाँधा गया । धोती के एक सिर पर डंडा बाँधकर उसे कुएँ में डाल दिया । दूसरा सिरा एक गाँठ लगाकर छोटे भाई को दे दिया और उसे मजबूती से पकड़ने के लिए कहा । लेखक ने छोटे भाई को विश्वास दिलाया कि वह कुएँ के नीचे पहुँचते ही साँप को मार देगा ।

लेखक धोती पकड़कर नीचे उतरा । अभी वह धरातल से चार – पाँच फुट ऊपर था कि उसे फन फैलाए लहराता हुआ साँप दिखाई दिया । लेखक बीचोंबीच उतर रहा था । डंडा नीचे लटक रहा था । कुएँ का धरातल अधिक चौड़ा न था । इसलिए उसे मारने के लिए नीचे उतरना ज़रूरी था । उसे अपना पाँव साँप से कुछ ही फुट की दूरी पर रखना पड़ा ।

एकाएक उसने अपने पाँव कुएँ की बगल पर टिका दिया । इससे मिट्टी नीचे गिरी । साँप फुफकारा । लेखक के पाँव दीवार से हट गए । थोड़ी ही देर में उसने अपने पाँव साँप के सामने धरातल पर टिका दिए । अब दोनों आमने – सामने थे । वे एक – दूसरे को देख रहे थे । इतनी खुली जगह नहीं थी कि डंडे को घुमाया जा सके । बस एक ही तरीका था कि साँप को कुचल डाला जाए परंतु यह खतरनाक था ।

लेखक ने देखा कि चिट्ठियाँ नीचे पड़ी थीं । उसने डंडे से चिट्ठी को सरकाना शुरू कर दिया । साँप ने अपना फन पीछे कर लिया परंतु जैसे ही डंडा चिट्ठी के पास पहुँचा साँप ने डंडे पर जोर से डंक मारा । डर के मारे लेखक के हाथों से डंडा छूट गया । वह खुद भी उछल पड़ा । उसने देखा कि डंडे पर साँप के डंक के तीन – चार निशान थे । इस संघर्ष की आवाज़ सुनकर ऊपर खड़े भाई की चीख निकल गई । उसने सोचा कि लेखक का काम तमाम हो गया ।

जब लेखक ने लिफाफा उठाने का प्रयास किया तो साँप ने वार किया । साँप का पिछला भाग लेखक के हाथों से छू गया । डंडे के लेखक की ओर खिंच आने से साँप का आसन बदल गया । लेखक ने तुरंत लिफाफे और पोस्टकार्ड चुन लिए और उन्हें धोती के छोर में बाँध दिया और छोटे भाई ने उन्हें ऊपर खींच लिया ।

अब लेखक को ऊपर चढ़ना था । यह ऊँचाई 36 फुट थी । उस समय उसकी अवस्था 11 वर्ष थी । इस चढ़ाई में उसकी छाती फूल गई और धौंकनी चलने लगी । ऊपर पहुँचकर वह काी देर तक बेहाल पड़ा रहा । लेखक ने 1915 ई . में मैट्रिक पास करने के बाद यह घटना माँ को सुनाई । माँ ने उसको अपनी गोद में छिपा लिया । लेखक को वे दिन बहुत अच्छे लगते थे ।

पाठ के शब्दार्थ

चिल्ला जाड़ा- कड़ी सर्दी

भयंकरता – कठिनता

कसूर – दोष

आशंका – डर

पेशी – बुलावा

प्रकोप – अत्यधिक क्रोध

कँपकँपी लगना – ठंड लगना

मज्जा- हड्डी के भीतर भरा हुआ मुलायम पदार्थ

भुँजाने – भुनवाने

नारायण वाहन होना – मौत का कारण

झुरे – तोड़ना

मूक- चुप ।मौन

प्रसन्नवदन – खुश चेहरा

नटखट – शरारती

वानर टोली – बंदरों का झुंड

उझकना – उचकना

सूझना – मन में बात आना

प्रतिध्वनि – गूँज

फुसकार – फुफकार

किलोल – क्रीड़ा

मृगसमूह हिरणों का झुंड

कहकहा लगाना – ठहाका लगाना

प्रवृत्ति – झुकाव

मृगशावक – हिरण का बच्चा

बिजली सी गिरना – अति भय का अनुभव होना

हत- घायल

पाट – पत्थर

आँखें डबडबाना – आँखों में आँसू भर जाना

उफ़ान – ऊपर उठना

उद्वेग – बेचैनी , घबराहट

तबीयत करना – मन चाहना

धुनाई होना- पिटाई होना

दिन का बुढ़ापा बढ़ना – दिन समाप्त होने को आना

दुधारी तलवार – दो धारवाली तलवार

दृढ़ संकल्प – पक्का इरादा

दुविधा – संदेह

बेड़ियाँ कटना – नष्ट होना

निर्णय – फ़ैसला

बुद्धिमत्ता – समझदारी

विषधर – ज़हरीला साँप

पासा फेंकना – खेल शुरू करना

आलिंगन – गले लगाना

मुठभेड़ – टक्कर

कड़ी – कठिन

आश्वासन- भरोसा

बाएँ हाथ का खेल – आसान काम

धरातल – नीचे की धरती

अक्ल चकराना – भय से हैरान होना

घातक – चोट पहुँचानेवाला

प्रतिद्वंद्वी – विपक्षी

परिधि – वृत की रेखा

व्यास – केंद्र को स्पर्श करती हुई परिधि के दो बिंदुओं को मिलानेवाली रेखा

पीठ दिखाना – डरकर भागना

एकाग्रचित्तता – ध्यान स्थिर रखना

सूझ – तरीका

समकोण –90 डिग्री का कोण

सटाना – साथ लगाना

आँखें चार होना – आमना – सामना होना

चक्षुःश्रवा – आँखों से सुननेवाला

मोहनी – माया

आकाश कुसुम – व्यर्थ की बात

भावी – आगे होनेवाला

मिथ्या – झूठी

असंभवता – संभव न हो सकता

तोप के मुहरे पर खड़े होना – मौत के सामने खड़े होना

पैंतरा – मुद्रा

मोरचा पड़ना – युद्ध के लिए तैयार होना

अचूक – खाली न जानेवाला

वार – आक्रमण

सूरत – स्थिति

बाध्य – मज़बूर

अवलंबन – सहारा

पीव – तरल पदार्थ, ज़हर

कायल – माननेवाला

उपहास – मजाक

भ्रातृ – स्नेह – भाईचारे की भावना

ताना – बाना- ढाँचा

बेजा- बेकार

गुंजल्क- गुत्थी , गाँठ

छोर – किनारा

धरना देना – सामने बैठना

बाँहें भरना – बाँहें थककर चूर होना

धौंकनी चलना- धड़कन तेज़ होना

झार – झूर – झाड़ – झूड़कर

ताकीद बार – बार चेतावनी देना

सजल नेत्र – गीले नेत्र

डैना – पंख

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