NCERT Class 10 Kshitij Chapter 3 Poem Explanation सवैया तथा कवित्त

NCERT Class 10 Kshitij Chapter 3 Poem Explanation सवैया तथा कवित्त

Kshitij Chapter 3 Poem Explanation सवैया तथा कवित्त

NCERT Class 10 Kshitij Chapter 3 Poem Explanation सवैया तथा कवित्त, (Hindi) exam are Students are taught thru NCERT books in some of the state board and CBSE Schools. As the chapter involves an end, there is an exercise provided to assist students to prepare for evaluation. Students need to clear up those exercises very well because the questions inside the very last asked from those.

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NCERT Class 10 Hindi Kshitij Chapter 3 Poem Explanation सवैया तथा कवित्त

 

पाठ की रूपरेखा

देव द्वारा रचित प्रथम सवैये में श्रीकृष्ण के रूप – सौंदर्य का वर्णन किया गया है , जो सामंती प्रवृत्ति का है तथा ‘ कवित्त ‘ के अंतर्गत प्रथम कवित्त में वसंत ऋतु को बालक के रूप में दर्शाकर प्रकृति के साथ उसका संबंध स्थापित किया गया है । दूसरे कवित्त में शरदकालीन पूर्णिमा की कांति को अनेक उपमानों के माध्यम से वर्णित किया गया है । शब्दों की आवृत्ति के द्वारा नया सौंदर्य पैदा करके उन्होंने सुंदर ध्वनि चित्र प्रस्तुत किए हैं । यहाँ पर कवि ने अलंकारिता एवं शृंगारिकता का प्रमुखता से प्रयोग किया है ।

 

सवैया एवं कवित्तों का भावार्थ

 

सवैया

1. पाँयनि नूपुर मंजु बजैं , कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई ।

साँवरे अंग लसै पट पीत , हिये हुलसै बनमाल सुहाई ।

माथे किरीट बड़े दृग चंचल , मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई ।

जै जग – मंदिर- दीपक सुंदर , श्रीब्रजदूलह ‘ देव ‘ सहाई ।।

शब्दार्थ

पाँयनि – पैर

नूपुर- घुँघरू / पायल

मंजु – सुंदर

कटि – कमर

किकिनि – करधनी

धुनि – आवाज़

मधुराई – मधुर / मीठी

साँवरे- साँवले

लसै- सुंदर

पट पीत- पीले वस्त्र

हिये – हृदय / गले में

हुलसै – आनंदित हो रहा है

बनमाल – वैजयंती माला

किरीट – मुकुट

दृग- आँखें

मुखचंद – चंद्रमा के समान मुख

जुन्हाई- चाँदनी

जग – मंदिर- दीपक – संसार रूपी मंदिर में दीपक के समान

श्रीब्रजदूलह- ब्रज के दूल्हे / श्रीकृष्ण

सहाई – सहायता करें

भावार्थ – प्रस्तुत सवैये में कवि ने श्रीकृष्ण के लौकिक सामंती रूप – सौंदर्य का वर्णन किया है । श्रीकृष्ण के पैरों में सुंदर पायल बज रही है । उनकी कमर में बँधी हुई करधनी ( कमरबंध ) से निकले मधुर स्वर अपनी मधुरता के कारण मन को आनंदित कर रहे हैं । श्रीकृष्ण के साँवले शरीर पर पीले वस्त्र अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं तथा उनके गले में वैजयंती माला ( पाँच रंग के फूलों की माला जो श्री कृष्ण पहनते थे ) बहुत सुंदर लग रही है । उनके सिर पर मुकुट है तथा उनके नेत्र बड़े – बड़े और चंचल हैं । उनके चंद्रमा रूपी मुख पर छाई हुई मंद – मंद हँसी चाँदनी के समान सुख प्रदान कर रही है । कवि देव कहते हैं कि संसार रूपी मंदिर में जलते सुंदर दीपक के समान सुशोभित ब्रज के दूल्हे अर्थात् श्रीकृष्ण हमारी सहायता करें ।

 

कवित्त

1. डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के ,

सुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दें ।

पवन झूलावैं , केकी – कीर बतरावैं ‘ देव ‘ ,

कोकिल हलावै हुलसावै कर तारी दै ।।

पूरित पराग सो उतारो करै राई नोन ,

कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।

मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि ,

प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै । ।

शब्दार्थ

द्रुम – पेड़

बिछौना – बिस्तर

पल्लव – पत्ते

सुमन झिंगूला – फूलों का इझबला

ढीला – ढाला वस्त्र

सोहै- अच्छा

छबि – सुंदर

पवन- हवा

केकी – मोर

कीर – तोता

बतरावैं – बात कर रहे हैं

हलावै हुलसावै- मन बहलाते

कर तारी दै- ताली बजा बजाकर

पूरित – भरा हुआ

पराग – फूलों के कण

नोन – नमक

कंजकली – कमल की कली

मदन – प्रेम और सौंदर्य का देवता कामदेव

महीप – राजा

ताहि – उसे

प्रातहि – सुबह

जगावत- जगा रहा है

चटकारी- चुटकी

भावार्थ – कवि देव वसंत ऋतु की कल्पना कामदेव के शिशु के रूप में करते हुए कहते हैं कि पेड़ की डाली उस बालक का पालना है तथा उस पर नए – नए पत्तों का बिस्तर बिछा हुआ है । बालक ने सुंदर फूलों का झबला पहना हुआ है , जो उसके शरीर की शोभा को और भी अधिक बढ़ा रहा है । हवा उसे झूला झुला रही है । मोर और तोता मीठे स्वर में बातें करके उसका मन बहला रहे हैं । कोयल आकर उसे हिलाती है तथा ताली बजा – बजाकर उसे प्रसन्न कर रही है अर्थात् उसका मन बहला रहे हैं ।

कमल की कली रूपी नायिका अपने सिर पर लताओं की साड़ी का पल्ला डालकर पराग रूपी राई और नमक से उसकी नज़र उतारने की रस्म पूरी कर रही है ताकि बसंत रूपी शिशु को किसी की नज़र न लगे । राजा कामदेव के वसंत रूपी शिशु को प्रातःकाल गुलाब चुटकी बजा बजाकर जगा रहा है ।

भाव यह है कि यहाँ वसंत को बालक रूप में दिखाकर प्रकृति के साथ प्रेम भरा संबंध स्थापित किया गया है । भाव यह है कि चारों ओर वसंत ऋतु का सौंदर्य छाया हुआ है , जिसके कारण पृथ्वी अत्यंत सुंदर लग रही है ।

2. फटिक सिलानि सौं सुधार्यौ सुधा मंदिर ,

उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद ।

बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए ‘ देव ‘ ,

दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद ।

तारा सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति ,

मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद ।

आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगें ,

प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद ।।

शब्दार्थ

फटिक सिलानि- स्फटिक नामक चमकदार पत्थर

सुधार्यौ – सँवारा हुआ

सुधा मंदिर – अमृत रूपी आकाश मंदिर को

उदधि- समुद्र

दधि – दही

अधिकाइ – बहुत अधिक

उमगे- उमड़े

अमंद- कम न होना

भीति – दीवार

फरसबंद – फर्श रूप में बना ऊँचा स्थान

तरुनि – युवती

मोतिन की जोति- मोतियों का प्रकाश

मल्लिका- सफ़ेद रंग का एक फूल

मकरंद – पराग

आरसी – आइना / शीशा

आभा- ज्योति

उजारी- उजाला

प्रतिबिंब – परछाई / छाया

भावार्थ – इसमें कवि ने शरदकालीन पूर्णिमा की रात में चाँद – तारों से भरे आकाश की शोभा का वर्णन किया है । पूर्णिमा की रात में आकाश संगमरमर के पत्थर से बने हुए मंदिर के समान लग रहा है । उसकी सुंदरता श्वेत दही के समुद्र के समान उमड़ रही है , वह कम नहीं हो रही है । वह सुंदरता दूध में से निकले झाग के समान आकाश रूपी मंदिर के अंदर और बाहर फैल रही है , जिसके कारण उसका ओर – छोर दिखाई नहीं दे रहा है । मंदिर के आँगन में दूध के झाग के समान चाँदनी आभा का फ़र्श बना हुआ है ।

आकाश रूपी मंदिर में तारें युवतियों के समान खड़े झिलमिलाते से प्रतीत हो रहे हैं और उनकी चमक ऐसी लग रही है जैसे मोतियों की चमक मल्लिका के फूलों के रस के साथ मिलकर प्रदीप्त हो उठी है । आकाश रूपी मंदिर का सौंदर्य शीशे के समान पारदर्शी लग रहा है और उसमें अपनी चाँदनी बिखेरता चाँद , प्यारी राधा के प्रतिबिंब के समान प्यारा लग रहा है ।

भाव यह है कि शरदकालीन पूर्णिमा की रात में चाँद – तारों से भरा आकाश अपनी सुंदरता एवं कांति से सभी को मंत्रमुग्ध कर रहा है ।

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